जब भी मेवाड़ के वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप और हल्दीघाटी के ऐतिहासिक युद्ध को याद किया जाता है, तो हमारे दिमाग में सबसे पहले उनके वफादार घोड़े चेतक का नाम आता है, लेकिन बहुत कम लोगों को पता है कि महाराणा प्रताप की सेना में बहादुर और वफादार जानवर था, जिसे खुद मुगल शहंशाह अकबर भी चाहता था। वह कोई इंसान नहीं, बल्कि महाराणा प्रताप का सबसे प्रिय और शक्तिशाली युद्ध-हाथी था, जिसका नाम रामप्रसाद था। हल्दीघाटी के युद्ध में उसकी खूंखार ताकत को देखकर अकबर इस कदर प्रभावित हुआ कि वह चेतक से ज्यादा इस हाथी को हासिल करने के लिए बेताब हो उठा। ऐसे में रोंगटे खड़े कर देने वाली इस हाथी की अमर गाथा के बारे में पता होना जरूरी है। आज का हमारा लेख इसी विषय पर है। आज हम आपको अपने इस लेख के माध्यम से बताएंगे कि कौन था रामप्रसाद और क्यों अकबर उसे अपनी सेना में शामिल करना चाहता था? जानते हैं इस लेख के माध्यम से...
कौन था रामप्रसाद? (Who Was Ramprasad)
रामप्रसाद महाराणा प्रताप की सेना का हाथी था, जो अपनी बेमिसाल ताकत और तेज दिमाग के लिए जाना जाता था। अकबर के दरबारी इतिहासकार अब्दुल कादिर बदायूंनी ने भी अपने ऐतिहासिक लेखों में रामप्रसाद की अद्भुत युद्ध कला के बारे में बताया है। उनके अनुसार, रामप्रसाद रणभूमि में दुश्मनों पर टूट पड़ता था।
अकबर की नजर हमेशा से भारत के सबसे शक्तिशाली हाथियों पर रहती थी, और रामप्रसाद की काबिलियत सुनकर वह उसे किसी भी कीमत पर अपनी मुगल सेना का हिस्सा बनाना चाहता था, ताकि उसका साम्राज्य और अजेय हो सके।
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हल्दीघाटी के युद्ध में क्या हुआ?
सन 1576 में हुए हल्दीघाटी के युद्ध में रामप्रसाद ने मुगलों की सेना में तबाही मचा दी थी। उसने अकेले ही अकबर की सेना के तीन सबसे ताकतवर और खूंखार हाथियों को मार गिराया और उनके महावतों को कुचल दिया। बता दें कि रामप्रसाद के इस पराक्रम से मुगल के पैर उखड़ने लगे थे। जब रामप्रसाद को सीधे युद्ध में हराना नामुमकिन हो गया, तो अकबर के आदेश पर मानसिंह ने एक क्रूर चक्रव्यूह रचा। इस अकेले हाथी को बंदी बनाने के लिए मुगलों ने 7 बड़े लड़ाकू हाथियों को मैदान में उतारा और उन पर 14 सबसे अनुभवी महावतों को बिठाया। चारों तरफ से घेरकर और कपट का सहारा लेकर आखिरकार मुगलों ने रामप्रसाद को बंदी बना लिया।
कैसे टूटा अकबर का गुरूर?
रामप्रसाद को बंदी बनाकर जब अकबर के सामने लाया गया, तो अकबर बेहद खुश हुआ। उसने इस जीत की खुशी में रामप्रसाद का नाम बदलकर पीर प्रसाद रख दिया। अकबर ने उसे अपने शाही अस्तबल में रखा और उसकी सेवा के लिए गन्ने, फल और पकवानों के ढेर लगा दिए, लेकिन अपने स्वामी महाराणा प्रताप से बिछड़ने का गम रामप्रसाद को बर्दाश्त नहीं हुआ। रामप्रसाद ने मुगलों की गुलामी स्वीकार करने के बजाय अन्न और जल का पूरी तरह त्याग कर दिया।
लगातार 18 दिनों तक भूखा-प्यासा रहने के कारण रामप्रसाद ने अपने प्राण त्याग दिए। उसकी इस अटूट वफादारी को देखकर अकबर का अहंकार चकनाचूर हो गया और वह रो पड़ा।
तब अकबर ने बेहद लाचार होकर कहा था, "जिस महाराणा प्रताप के हाथी ने मेरे सामने अपना सिर नहीं झुकाया और अपनी जान दे दी, उस वीर प्रताप को मैं भला कैसे झुका पाऊंगा!"
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