कई बार हमें जो कुछ बाहर से दिखाई देता है, वह सत्य नहीं होता। स्वतंत्रता सहज मानवीय प्रवृत्ति है और हमें भी ऐसा लगता है कि हम आजाद हैं, पर वास्तव में ऐसा नहीं है। हम शरीर और मन से जुड़े कई बंधनों की जंजीरों में जकडे हैं। हम अपनी इच्छाओं के गुलाम हैं तथा हमारे ऊपर परिवार और समाज की तरफ से कई तरह के दबाव होते हैं। हर जगह व्यक्ति ऐसे बंधनों से मुक्ति चाहता है। अब सवाल यह उठता है कि व्यक्ति को आंतरिक आजादी कैसे मिले? अनुशासित जीवन जीने के लिए कुछ सामाजिक नियमों के बंधनों का होना भी जरूरी है। ऐसे में विविध बंधनों के बावजूद हम स्वयं को स्वतंत्र कैसे रख सकते हैं? इसके लिए हमने आध्यात्मिक चिंतक डॉ.मयंक मुरारी से बात की है। जानते हैं...
पहचानें अपनी कमजोरियां
अगर आप सही मायने में आजाद होना चाहते हैं तो सबसे पहले ईमानदारी से आत्म-मूल्यांकन करते हुए अपनी कमजोरियों को पहचानकर उन्हें दूर करने की कोशिश करें। जिस दिन आप ऐसा करने में कामयाब होंगे, उसी दिन सही मायने में आत्मिक रूप से स्वतंत्र हो जाएंगे। जब व्यक्ति अपनी सभी इच्छाओं को नियंत्रित करने में सक्षम हो जाता है, तो वह सुख-दुख में समभाव रहता है।
रहें सहज और सुखी
अपने जीवन को पहले से ज्यादा बेहतर बनाने की दिशा में निरंतर प्रयत्नशील रहें और पूर्णता की खोज करें। इसके लिए मन से सरल होना बहुत जरूरी है, लेकिन हमारे मन की जटिलता हमें सही निर्णय लेने से रोकती है और हम अपूर्ण रह जाते हैं। जटिल होने के कारण ही हम पाने के बजाय, जीवन भर सिर्फ खोते हैं।
न बनें हालात के गुलाम
क्या हमारे आसपास का सामाजिक वातावरण हमारी आजादी को प्रभावित करता है? स्वतंत्रता की खोज जीवन भर चलती रहती है। हमारे पूर्वजों के अथक प्रयास और बलिदान के बाद देश को विदेशी शासन से आजादी मिली, पर आज आधी सदी से भी ज्यादा वक्त बीत जाने के बाद भी क्या हम आत्मिक रूप से आजाद हैं?
मोह से मिले मुक्ति
समस्त संसार मोह-माया के बंधन से जकडा हुआ है। हर व्यक्ति मनचाहा लक्ष्य हासिल करने की कोशिश में निरंतर जुटा रहता है। कभी उसके मन में धन-प्राप्ति की लालसा प्रबल होगी, तो कभी वह यश पाने की होड़ में शामिल होगा।
अंतर्मन में हो पवित्र भावना
दरअसल स्वाधीनता शब्द 'स्व' और 'अधीन' इन दो शब्दों से मिलकर बना है, जिसका अर्थ है- जो व्यक्ति दूसरों के बजाय स्वयं के अधीन है, वह ज्ञान को स्वीकार करते हुए निरपेक्ष आचरण करता है और अपने विवेक से सही निर्णय लेता है। सही मायने में वही व्यक्ति स्वाधीन है।
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संस्कृति में समाहित स्वतंत्रता
सनातन धर्म और भारतीय संस्कृति में आदिकाल से ही स्वतंत्रता को विशेष महत्व दिया गया है। इसके लिए कर्मों के बंधन से मुक्त होकर स्वयं को उस परम चेतना से जोडना आवश्यक है। स्वयं को ईश्वर से एकात्म करें।
करें सत्य की खोज
सत्य की खोज के माध्यम से व्यक्ति स्वतंत्रता को प्राप्त कर सकता है। इसकी शुरुआत व्यक्ति के अस्तित्व के लिए संघर्ष से होती है। भारतीय चिंतन का मूल आधार ही मानव स्वतंत्रता है।
स्वयं के लिए 5 संकल्प
- देश और समाज के प्रति अपने सभी कर्तव्यों का निर्वाह करेंगे।
- अपने आसपास मौजूद लोगों की आजादी का सम्मान करेंगे।
- जरूरतमंदों की मदद करेंगे।
- हमेशा सच्चाई के रास्ते पर चलेंगे।
- बच्चों को ऐसे संस्कार देंगे कि वे भविष्य में जिम्मेदार नागरिक बनें।
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