ओडिशा के पुरी में बना जगन्नाथ मंदिर सिर्फ एक धार्मिक स्थल नहीं बल्कि आस्था, इतिहास और परंपराओं का अनोखा संगम भी है। इन दिनों तो जगन्नाथ रथ यात्रा भी चल रही है। ऐसे में यह मंदिर चर्चा का विषय बना हुआ है। इस मौके पर लाखों लोग यहां आते हैं और मंदिर से जुड़ी परंपराओं और रहस्यों के बारे में जानना चाहते हैं। उन्हीं रहस्यों में से एक नीलचक्र और उस पर लहराता हुआ ध्वज है।
इसकी खास बात यह है कि नीलचक्र और चक्र काफी दूर से ही श्रद्धालुओं को नजर आ जाता है। माना जाता है कि इनका दर्शन भी भगवान जगन्नाथ की कृपा पाने जैसा है। ऐसे में लोग जानना चाहते हैं कि यह नीलचक्र क्या है, इसका धार्मिक महत्व क्या है, मंदिर के ऊपर हर दिन नया ध्वज क्यों लगाया जाता है और इसके पीछे कौन-सी परंपराएं जुड़ी हैं?
क्या है जगन्नाथ मंदिर का नीलचक्र?
जगन्नाथ मंदिर की मुख्य शिखर के सबसे ऊपर वाले हिस्से में एक बड़े से धातु का चक्र लगा हुआ है, जिसे नीलचक्र कहा जाता है। संस्कृत में नील का मतलब गहरा नीला या श्याम रंग माना जाता है, जबकि चक्र का मतलब पहिया या चक्र होता है। यह नीलचक्र मंदिर के सबसे ऊंचे हिस्से पर लगा हुआ है और पुरी शहर में कई जगहाें से इसे आसानी से देखा जा सकता है।
कुछ श्रद्धालु ताे ऐसे हैं जो इसे भगवान विष्णु के सुदर्शन चक्र का प्रतीक मानते हैं। चूंकि भगवान जगन्नाथ को भगवान विष्णु का ही एक स्वरूप माना जाता है, इसलिए नीलचक्र का महत्व और भी बढ़ जाता है।
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अष्टधातु से बना है नीलचक्र
आपको बता दें कि नीलचक्र केवल सजावट के लिए नहीं लगाया गया है। यह एक खास धातु को मिक्स करके बनाया गया है जिसे अष्टधातु कहा जाता है। हिंदू परंपराओं में अष्टधातु का इस्तेमाल लंबे समय से धार्मिक चीजों और मंदिरों में किया जाता रहा है।
नीलचक्र का धार्मिक महत्व
हिंदू मंदिर वास्तुकला में शिखर पर लगे चक्र को बहुत खास माना जाता है। इसे धरती और आकाश के बीच एक आध्यात्मिक कड़ी का प्रतीक बताया गया है। कहा जाता है कि नीलचक्र भगवान जगन्नाथ की दिव्य उपस्थिति का संकेत है। यही कारण है कि दूर से भी इसके दर्शन करने को शुभ माना जाता है।
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नीलचक्र पर फहराया जाता है मंदिर का ध्वज
ये तो आप सभी को मालूम है कि नीलचक्र के ऊपर ही एक ध्वज लगाया जाता है, जो मंदिर की पहचान बन चुका है। यह ध्वज आमतौर पर त्रिकोण होता है। इसके रंग धार्मिक अवसरों और तिथियों के अनुसार बदल सकते हैं, लेकिन केसरिया और डार्क लाल रंग के ध्वज सबसे ज्यादा लगाए जाते हैं।
यह ध्वज केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं है, बल्कि भगवान जगन्नाथ की उपस्थिति का संदेश भी माना जाता है। जैसे किसी राजा के महल पर लगा ध्वज उसके वहां होने का संकेत होता है, उसी तरह मंदिर का झंडा भी श्रद्धालुओं को बताता है कि भगवान अपने धाम में विराजमान हैं।
रोज बदला जाता है ध्वज
जगन्नाथ मंदिर की सबसे अनोखी परंपराओं में से एक है ध्वज कसो रोजाना बदलना। मंदिर के ऊपर जो नीलचक्र लगा है, वहां हर रोज नया ध्वज लगाया जाता है। यह काम खासतौर से ट्रेंड लोग ही करते हैं। यह परंपरा कई पीढ़ियों से चली आ रही है और आज भी उसी श्रद्धा के साथ निभाई जाती है। कहते हैं कि अगर ध्वज एक दिन भी ना बदल गया, तो मंदिर 18 साल के लिए बंद हो जाएगा।
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पतित पावन से जुड़ा है ध्वज का महत्व
आपको बता दें कि जगन्नाथ मंदिर के इस ध्वज को पतित पावन ध्वज भी कहा जाता है। क्योंकि यह भगवान जगन्नाथ का ही एक नाम है। इसका मतलब है कि ऐसे भगवान जो हर किसी पर कृपा करते हैं और सभी को अपने समान मानते हैं।
हजार साल से भी पुरानी है परंपरा
जगन्नाथ मंदिर का मौजूदा ढांचा 12वीं सदी में राजा अनंतवर्मन चोडगंग देव ने बनवाया था। हालांकि हमारी पुरानी धार्मिक किताबों में इस जगह का जिक्र इससे भी बहुत पहले से मिलता है। 'स्कंद पुराण' में पुरी को पुरुषोत्तम क्षेत्र कहा गया है, जहां भगवान जगन्नाथ और उनके मंदिर के बारे में विस्तार से बताया गया है।
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डिसक्लेमर: इस लेख में दी गई जानकारियां धार्मिक मान्यताओं, लोककथाओं और पारंपरिक आस्थाओं पर आधारित हैं। इसका उद्देश्य किसी भी प्रकार का भ्रम फैलाना या अंधविश्वास को बढ़ावा देना नहीं है, बल्कि मंदिर से जुड़ी पौराणिक और प्रचलित मान्यताओं को पाठकों तक पहुंचाना है।
Source
https://www.incredibleindia.gov.in/en/odisha/puri/sri-jagannath-temple
Image Credit- shriprasadam/incredible india
