सावन महीने में शंकर जी के दर्शन और पूजन का विशेष महत्व है। उत्तर प्रदेश में वाराणसी के पास स्थित 'श्री मार्कण्डेय महादेव मंदिर' बाबा विश्वनाथ के बाद क्षेत्र का सबसे प्रमुख और सिद्ध शिवधाम माना जाता है। वाराणसी के चौबेपुर क्षेत्र के कैथी गांव में गंगा और गोमती नदी के पवित्र संगम पर बसा यह मंदिर श्रद्धालुओं की आस्था का बड़ा केंद्र है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से की गई पूजा से अकाल मृत्यु का भय टल जाता है और संतान सुख की प्राप्ति होती है। ऐसे में मार्कण्डेय महादेव मंदिर का इतिहास और कथा के बारे में पता होना जरूरी है। जानते हैं आगे...

मार्कण्डेय पुराण महादेव मंदिर का इतिहास और कथा

धार्मिक ग्रंथों और मार्कण्डेय पुराण के अनुसार, यह पावन धाम ऋषि मार्कण्डेय की तपोभूमि है। इस स्थल के निर्माण और नामकरण के पीछे एक पौराणिक कथा जुड़ी हुई है।

मृकंदु ऋषि की कठोर तपस्या

प्राचीन काल में मृकंदु ऋषि और उनकी पत्नी मरुदवती निसंतान थे। संतान प्राप्ति के लिए उन्होंने भगवान शिव की कठोर तपस्या की।

भोलेनाथ उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर प्रकट हुए और उनके सामने दो विकल्प रखे, या तो वे एक दीर्घायु, लेकिन साधारण पुत्र प्राप्त करें, या फिर एक अत्यंत बुद्धिमान, गुणी परंतु अल्पायु मात्र 16 वर्ष की आयु वाला पुत्र। दंपत्ति ने दूसरे विकल्प को चुना।

बालक मार्कण्डेय का जन्म और अटूट शिव भक्ति

समय आने पर माता मरुदवती ने एक दिव्य बालक को जन्म दिया, जिसका नाम मार्कण्डेय रखा गया। बालक मार्कण्डेय असाधारण प्रतिभा के धनी थे और अल्पायु में ही उन्होंने समस्त वेद-शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त कर लिया। जब उनकी आयु 16 वर्ष के करीब पहुंची, तो उनके पेरेंट्स चिंतित रहने लगे। सत्य जानकर बालक मार्कण्डेय ने भयभीत होने के बजाय गंगा-गोमती संगम के तट पर शिवलिंग स्थापित कर स्वयं को भगवान शिव की आराधना में समर्पित कर दिया।

जब यमराज का आगमन हुआ

जब ऋषि मार्कण्डेय की आयु का 16वां वर्ष पूरा हुआ, तो मृत्यु के देवता यमराज उनके प्राण हरने के लिए पृथ्वी पर आए। उस समय बालक मार्कण्डेय शिवलिंग से लिपटकर महामृत्युंजय मंत्र का जाप कर रहे थे। यमराज ने जैसे ही बालक मार्कण्डेय पर अपना यमपाश फेंका, उसी पल अत्यंत क्रुद्ध होकर भगवान शिव शिवलिंग को चीरकर प्रकट हो गए।

भगवान शिव ने यमराज के इस प्रयास को रोकते हुए अपने भक्त की रक्षा की और यमराज को वापस जाने पर विवश कर दिया। महादेव ने मार्कंडेय को अमरता का वरदान दिया और कहा कि वे सदैव 16 वर्ष के ही रहेंगे। इसी घटना के बाद भगवान शिव का यह रूप 'महामृत्युंजय' और यह पावन स्थल 'मार्कण्डेय महादेव' के नाम से संसार में प्रसिद्ध हुआ।

मार्कण्डेय मंदिर का धार्मिक महत्व

मार्कण्डेय महादेव धाम महामृत्युंजय स्वरूप में भगवान शिव की आराधना का सबसे बड़ा केंद्र माना जाता है। 

  • अकाल मृत्यु और गंभीर रोगों से मुक्ति: मान्यता है कि यहां महामृत्युंजय जाप और दर्शन करने से रोगों से राहत मिलती है तथा अकाल मृत्यु का भय समाप्त हो जाता है।
  • संतान प्राप्ति और वंश वृद्धि: यह मंदिर विशेष रूप से संतान प्राप्ति की मनोकामना पूरी करने और गर्भ संबंधी बाधाओं को दूर करने के लिए प्रसिद्ध है।
  • सावन और प्रदोष का महत्व: वैसे तो यहां पूरे साल भक्तों का तांता लगा रहता है, लेकिन सावन मास, महाशिवरात्रि, प्रदोष व्रत और त्रयोदशी तिथि पर यहाँ जल चढ़ाने का विशेष फल मिलता है।

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मंदिर खुलने का समय

इस मंदिर में जाने के लिए श्रद्धालुओं के लिए कपाट सुबह 3:00 बजे खुल जाते हैं और रात 11:00 बजे तक दर्शन-पूजन का क्रम चलता रहता है। इस समय में बदलाव वहां के पुजारी पर निर्भर करता है।

मार्कण्डेय महादेव मंदिर कैसे पहुंचे

यह मंदिर वाराणसी शहर से लगभग 30 किलोमीटर की दूरी पर वाराणसी-गाजीपुर राजमार्ग पर स्थित है।

सड़क मार्ग द्वारा

वाराणसी या गाजीपुर से कैथी गांव (पिन कोड: 221116) के लिए सीधे बस, टैक्सी या पर्नल वाहन आसानी से मिल जाते हैं।

ट्रेन द्वारा

  • निकटतम छोटा स्टेशन: राजवारी रेलवे स्टेशन (मंदिर से मात्र 4.2 किमी)
  • निकटतम जंक्शन: औनिहार जंक्शन (लगभग 11 किमी)
  • वाराणसी सिटी रेलवे स्टेशन: मंदिर से लगभग 26.7 किमी की दूरी पर है।

हवाई मार्ग द्वारा

लाल बहादुर शास्त्री अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा (बाबतपुर, वाराणसी) से मार्कण्डेय महादेव मंदिर की दूरी लगभग 44.3 किलोमीटर है। हवाई अड्डे से टैक्सी के जरिए कैथी पहुंचा जा सकता है।

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Images: markandeymahadevkaithi