देशभर में दिवाली की राैनक देखने को मिल रही है। इस दिन हर घर में माता लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है, लेकिन क्या आप जानती हैं कि देश में एक ऐसा राज्य भी है जहां गणेश-लक्ष्मी नहीं बल्कि मां काली की पूजा की जाती है। जी हां, हम बात कर रहे हैं वेस्ट बंगाल की। पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता समेत कई इलाकों में दिवाली को काली पूजा या श्यामा पूजा के रूप में मनाया जाता है।
यहां कार्तिक महीने की अमावस्या की रात मां लक्ष्मी की जगह मां काली की पूजा की जाती है। इस दौरान बड़े-बड़े पंडाल सजाए जाते हैं। साथ ही आधी रात के समय खास पूजा होती है। आज हम आपको अपने इस लेख में बता रहे हैं कि ऐसा क्यों होता है और इसके पीछे की कहानी क्या है? आइए जानते हैं-
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कोलकाता में दिवाली की रात क्यों होती है मां काली की पूजा?
वेस्ट बंगाल में दिवाली की रात को मां काली की पूजा करने की पुरानी परंपरा है। इसे काली पूजा और श्यामा पूजा भी कहा जाता है। वहीं देश के दूसरे कई हिस्सों में इसी समय मां लक्ष्मी और भगवान गणेश की पूजा की जाती है। माना जाता है कि कार्तिक अमावस्या की रात ही मां काली ने विकराल रूप धारण करके रक्तबीज और बाकी दुष्ट राक्षसों का संहार किया था, जिससे सृष्टि की रक्षा हुई थी।
बंगालियों में मां काली के प्रति है गहरी आस्था
बंगाल और कोलकाता में आदि शक्ति (नारी ऊर्जा) के प्रति गहरी आस्था है। यहां मां काली को भय का नाश करने वाली और बुराइयों पर विजय दिलाने वाली माता माना जाता है। इसीलिए मां काली की पूजा यहां दिवाली पर की जाती है। कहते हैं कि मां काली की पूजा करने से बुरी शक्तियों का नाश होता है और जिंदगी की परेशानियां भी कम हो सकती हैं। बंगाल में इस दिन लोग मां के दर्शन करने के लिए पंडालों में पहुंचते हैं। कई जगहों पर आधी रात को पूजा की जाती है। मां के सामने दीपक जलाकर उनका आशीर्वाद मांगा जाता है।
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काली पूजा में जलाया जाता है अखंड दीपक
बंगाल में काली पूजा के दौरान मां की नई मूर्ति स्थापित की जाती है और उनकी खास तरीके से पूजा होती है। कई जगहों पर यह पूजा आधी रात को की जाती है। इस दौरान मां के सामने अखंड दीपक जलाने की भी परंपरा है। अखंड दीपक का मतलब है ऐसा दीपक जिसे पूजा के दौरान लगातार जलाकर रखा जाता है।
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डिस्क्लेमर (Disclaimer): इस लेख में दी गई जानकारियां धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं पर आधारित हैं। हरजिंदगी इसमें दिए गए तथ्यों और दावों की सत्यता की पुष्टि नहीं करता है। किसी भी परंपरा या पूजा-विधि को अपनाने से पहले संबंधित क्षेत्र के विशेषज्ञों या विद्वानों की सलाह अवश्य लें।
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