हरतालिका तीज का पर्व प्रत्येक वर्ष भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाता है। इस साल यह पर्व 14 सितंबर के दिन मनाया जाएगा। इस मौके पर महिलाएं निर्जला उपवास रखती हैं और भगवान शिव और पार्वती माता की रेत से मूर्ति बनाकर पूजा-अर्चना करती हैं। साथ ही इस दिन रातभर जगने की परंपरा है। यह पर्व माता पार्वती के तप और शिव-पार्वती के पवित्र के मिलन प्रतीक का है। जैसा कि हम सभी को पता है कि माता पार्वती ने भगवान को पाने के लिए कई वर्षों तक घने जंगल में तप किया था। नीचे लेख में वाराणसी के पंडित राघवेंद्र तिवारी से जानते हैं कि मां पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए कितने साल तप किया और इसे लेकर क्या कथा है?

मां पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए कितने साल तप किया?

हिंदू पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए माता पार्वती ने हजारों वर्षों तक अत्यंत कठिन और कठोर तपस्या की थी। पुराणों के मुताबिक, माता पार्वती ने कुल हजारों वर्षों (लगभग 14,000 वर्ष) तक अलग-अलग चरणों में घोर तप किया था। उनकी इस अचल भक्ति और प्रेम ने यह साबित कर दिया कि सच्ची निष्ठा और अटूट विश्वास से असंभव को भी संभव किया जा सकता है।

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सती रूप त्यागने के बाद पर्वतराज हिमालय के यहां लिया जन्म

माता पार्वती पिछले जन्म में माता सती थीं। सती के रूप में शरीर त्यागने के बाद उन्होंने पर्वतराज हिमालय के यहां पुत्री के रूप में जन्म लिया। बचपन से ही उनके मन में भगवान शिव के प्रति अगाध प्रेम था और उन्होंने देवर्षि नारद के मार्गदर्शन पर चलकर महादेव को ही पति रूप में पाने का संकल्प लिया। अपनी इस जिद्द और भक्ति को पूरा करने के लिए उन्होंने राजसी सुख-सुविधाओं का त्याग कर दिया और जंगलों में कड़ा पहरा देते हुए साधना शुरू की।

  • तपस्या के शुरुआती दौर में उन्होंने केवल कंद-मूल और फल खाकर कई हजार वर्ष बिताए।
  • समय के साथ उन्होंने फलों का त्याग कर दिया और केवल पेड़ों से गिरे सूखे पत्तों को खाकर तप किया।
  • अंतिम चरणों में उन्होंने पत्तों का आहार भी छोड़ दिया और केवल हवा तथा जल के सहारे ध्यान लगाया, जिससे उनका शरीर अत्यंत क्षीण हो गया।

हरतालिका तीज की अनसुनी कथा और अपर्णा नाम

माता पार्वती ने भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया और हस्त नक्षत्र के दिन पूरी तरह निराहार रहकर बालू से शिवलिंग का निर्माण किया। उन्होंने रातभर जागकर विधि-विधान से भगवान शिव की पूजा की और कठिन उपवास रखा। इस दौरान उन्होंने सूखे बेलपत्र खाना भी बंद कर दिया था, जिसके बाद उनका एक नाम 'अपर्णा' भी पड़ गया। इसका अर्थ ऐसा व्यक्ति जिसने पत्ते भी न खाए हों।

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हरतालिका तीज नाम के पीछे की कहानी

माता पार्वती की इस अदम्य तपस्या, बालू के शिवलिंग की पूजा और अटूट संकल्प से तीनों लोक और स्वयं भगवान शिव की समाधि हिल उठी। महादेव ने प्रकट होकर उनकी तपस्या को स्वीकार किया और उन्हें अपनी पत्नी के रूप में पाने का वरदान दिया। चूंकि माता पार्वती को उनकी सखी (हरत) द्वारा अपहरण कर (तपस्या के लिए सुरक्षित स्थान पर ले जाकर) इस प्रकार सुरक्षित रखा गया था और उन्होंने ताली (सहेली) के साथ मिलकर यह व्रत किया था, इसलिए इस पावन व्रत का नाम 'हरतालिका' पड़ा।

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