आज हम भले ही कितना मॉडर्न क्यों न हो जाए या फिर रसोई के बर्तनों को कितना ही क्यों न बदल दिया जाए? एक ऐसी चीज है, जो हर एक भारतीय किचन में देखने को आसानी से मिल जाएगी। अब आप सोच रही होंगी कि भला यह क्य चीज है, तो बता दें कि यह है फूल पत्ती वाली चम्मच। शायद ही ऐसा कोई घर होगा, जहां यह चम्मच न हो। दिल्ली हो लखनऊ हो, मुबंई हो या फिर पटना, हर रसोई की दराज में यह स्पून आसानी से दिख जाएगा। मानो किसी ने हर एक घर में इसकी जगह तय की हो। ऐसे में क्या आपने कभी इस बात पर गौर किया कि आखिर ऐसा कैसे? अगर नहीं, तो आज के इस लेख में हम आपको बताने जा रहे हैं कैसे यह चम्मच देश के हर एक कोने तक पहुंची और इसकी शुरूआत कैसे हुई?

फूल पत्ती वाले चम्मच को लेकर दिए जाते हैं अलग-अलग तर्क

फूल पत्ती वाले चम्मच को लेकर सोशल मीडिया पर आपको अलग-अलग तर्क देखने और पढ़ने को मिल जाएंगे। ऐसे में इसकी शुरूआत को विभिन्न तर्क दिए जाते हैं।

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कई लोगों कहते हैं, कि यह चम्मच रोजमर्रा के सामान के साथ पहले फ्री में आती थी। अगर आपको याद हो, तो कुछ साल पहले चायपत्ती, अगबत्ती आदि चीजों के साथ अलग-अलग बर्तन गिफ्ट के तौर पर फ्री मिलते थे। इसे लेकर ऐसा कहा जाता था कि उस वक्त कुछ ब्रांड ने इस तरह कि डिजाइन वाली चम्मच देना शुरू किया, जिसके बाद से यह इतना कॉमन हो गया है।

कब और किसने बनाई थी पहली चम्मच?

इस चम्मच के आखिर में सैलो का लोगो होता था। बाद में कुछ चम्मच बनाने वालों ने वही डिजाइन कॉपी किया है। हालांकि, इसका कोई ऑफिशियल रिकॉर्ड नहीं है। यह जानकारी कुछ यूजर्स की ओर से दावा किया जाता है।

इस डिजाइन के पीछे का इतिहास

भारत में जब स्टेनलेस स्टील का नया-नया चलन तेजी से लोकप्रिय हो रहा था। एल्युमिनियम और पीतल के बर्तनों की जगह मजबूत और चमकदार स्टील ले रहा था। उस समय चम्मचों पर इस तरह के फूलों और पत्तियों के डिजाइन को 'पेंटोग्राफ' या 'इचिंग' तकनीक से उकेरा जाता था। उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद और देश के अन्य बर्तन निर्माण केंद्रों पर कारीगर हाथ या शुरुआती मशीनों की मदद से इन सुंदर पैटर्नों को बनाते थे। यह डिजाइन इतना लोकप्रिय हुआ कि हर घर के डाइनिंग टेबल पर इसकी एक अलग ही जगह बन गई।

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आज भी क्यों है इसका खास क्रेज?

आज भले ही मॉडर्न और मिनिमलिस्टिक कटलरी का दौर हो, लेकिन 90 के दशक वाली उस फूल-पत्ती वाली चम्मच की बात ही कुछ और है। यह आज भी हमें हमारे बचपन के दिनों, स्कूल की छुट्टियों और मां के हाथों बने खाने की याद दिलाती है। कई लोग इसे आज भी एंटीक या नॉस्टैल्जिक पीस के रूप में संभाल कर रखते हैं।

डिस्क्लेमर

इस लेख में दी गई जानकारी इंटरनेट पर चल रही बातों और लोगों के अनुभवों पर आधारित है। इस चम्मच के इतिहास या शुरुआत को लेकर कोई सरकारी कागजात या रिकॉर्ड मौजूद नहीं है। इसका उद्देश्य केवल पुरानी यादों को ताजा करना है। अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।

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