जब भी हम किसी दुल्हन की बात करते हैं, तो उसकी नथ के बिना श्रृंगार अधूरा लगता है। चाहे वो मराठी नथ हो या पहाड़ी दुल्हन की नथुली, नथ हर लुक को रॉयल बना देती है। क्या आपने कभी सोचा है कि ये छोटा सा गहना भारत में आया कहां से? लोग समझते हैं कि नथ प्योर इंडियन है, पर इसका सफर तो मध्य-पूर्व के रेगिस्तानों से शुरू हुआ था। हजारों साल पहले इसे शानो-शौकत और दौलत का प्रतीक माना जाता था, और आज ये सोलह श्रृंगार का सबसे अहम हिस्सा बन चुका है।

नथ में छुपा है, सालों पुराना इतिहास

भारत में गहने सिर्फ सजने-संवरने के लिए नहीं पहने जाते हैं, हर गहने के पीछे एक कहानी और मान्यता जुड़ी होती है। नथ भी ऐसी ही है। इसे सिर्फ सुंदरता के लिए नहीं, बल्कि शादीशुदा जिंदगी की खुशहाली और आस्था से भी जोड़ा जाता है। कहा जाता है कि नथ पहनना देवी पार्वती को समर्पित है, जो वैवाहिक सुख और प्रेम की देवी हैं। तभी तो कन्याकुमारी मंदिर में देवी की नाक की नथ में लगा हीरा आज भी मीलों दूर से चमकता हुआ दिखता है। आइए Cultural and Historical implication of Museum Collection: Representation of Regions and Tribes in the Nose Rings of Amrapali Museum of Jaipur की रिसर्च से जानते हैं कि भारत में कहां से नथ परंपरा?

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कुछ ग्रंथों के अनुसार सुश्रुत संहिता में नाक छेदन का जिक्र मिलता है, लेकिन ज्यादातर इतिहासकार मानते हैं कि नथ भारत में मुगलों के साथ 16वीं सदी में आई। मुगल मध्य-एशिया से आए थे और वहां नाक में गहना पहनना आम था, जिसे शनफ कहा जाता था। बाइबिल में भी इसका जिक्र है जब अब्राहम के सेवक ने रिबका को सोने की नथ उपहार में दी थी। मुगलों के आने के बाद राजपूत और मराठा रानियों ने इसे अपनाया और फिर ये शाही महलों से निकलकर आम भारतीय महिलाओं तक पहुंच गया।

नथ का धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व

1. शादी का प्रतीक

पश्चिम में जैसे शादी के बाद वेडिंग रिंग पहनी जाती है, भारत में नथ सुहाग का प्रतीक है। इसे पहनना पति की लंबी उम्र और खुशहाल वैवाहिक जीवन की कामना से जुड़ा है।

2. देवी पार्वती से जुड़ाव

हिंदू मान्यता में नथ को देवी पार्वती का आशीर्वाद माना जाता है। इसलिए, दुल्हन अपनी नथ के जरिए देवी से सुखी दांपत्य जीवन का वरदान मांगती है।

3. बुरी नजर से बचाव

कई गांवों में आज भी माना जाता है कि नथ दुल्हन को बुरी नजर से बचाती है। ये एक सुरक्षा कवच की तरह काम करती है।

4. आयुर्वेद से कनेक्शन

आयुर्वेद में कहा गया है कि बाईं नाक का संबंध महिला के प्रजनन अंगों से होता है। बायीं नाक छिदवाने से मासिक धर्म का दर्द और प्रसव पीड़ा कम होती है। हालांकि, इसका वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है; पर यह मान्यता सदियों से चली आ रही है।

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भारत में नथ हर राज्य की पहचान

नथ एक जैसी नहीं होती, भारत की विविधता इसमें भी दिखती है।

महाराष्ट्र की ब्राह्मणी नथ

ये नथ अर्धचांद के आकार की होती है। पेशवा काल से चली आ रही है, इसलिए इसे पेशवाई नथ भी कहते हैं। इसमें बीच में एक बड़ा मोती और किनारे पर छोटे-छोटे रूबी या पन्ने लगे होते हैं। इसका साइज काफी बड़ा होता है और ये गाल तक आती है। बाजीराव मस्तानी फिल्म के बाद ये नथ पूरे भारत में ट्रेंड में आ गई।

उत्तराखंड की नथुली

नथुली गढ़वाल-कुमाऊं की दुल्हनों की सबसे बड़ी पहचान है। ये शायद भारत की सबसे बड़ी और भारी नथ है, जो लगभग पूरे गाल को कवर कर लेती है। पूरी तरह शुद्ध सोने से बनती है और इसमें मोतियों का गुच्छा लटका होता है। मान्यता है कि नथुली जितनी बड़ी और भारी, परिवार उतना ही संपन्न रहेगा। आजकल इसमें लाइट वेट डिजाइन भी आने लगे हैं।

पंजाब और उत्तर प्रदेश की लटकन वाली नथ

इसे बड़ी नथ या कोका भी कहते हैं। ये गोल्ड की बड़ी गोल रिंग होती है जिसके नीचे मोतियों और कुंदन की कई लड़ियां लटकती हैं। पंजाबी और अवधी दुल्हनों में ये बहुत पसंद की जाती है क्योंकि इसका लटकन वाला डिजाइन चेहरे को बहुत रॉयल लुक देता है।

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राजस्थान की भंवरिया

राजस्थान और गुजरात में इसे नथड़ी या कांटा कहते हैं। ये बिना छेद वाली नाक पर पहनी जाने वाली नथ है जो कान में एक चेन (भंवरिया) से अटकी होती है। इसका डिजाइन बड़ा और नक्काशीदार होता है। राजपूती पोशाक के साथ ये नथ राजशाही का प्रतीक मानी जाती है।

कश्मीर की देहर और बंगाल की नोलोक

देहर (Dejhoor): कश्मीरी पंडित महिलाएं शादी के बाद जो लंबी झुमके जैसी ज्वेलरी पहनती हैं, उसे देहर कहते हैं। ये नथ नहीं बल्कि कान की ज्वेलरी है पर नथ की तरह ही सिंदूर और सुहाग से जुड़ी है। कई लोग कश्मीरी गोल्डन चेन वाली बड़ी नथ को भी देहर ही समझ लेते हैं।

नोलोक: बंगाली दुल्हनों की फूल के आकार की छोटी नथ। इसमें बीच में एक बड़ा मोती और चारों तरफ पंखुड़ियों जैसा डिजाइन होता है। ये नाक के बीचो-बीच पहनी जाती है और बहुत ही नाजुक दिखती है।

दक्षिण भारत की मुक्कुथी

तमिलनाडु, केरल और कर्नाटक में इसे मुक्कुथी या बुलाकू कहते हैं। ये सबसे सिंपल नथ है, सोने या हीरे की एक छोटी सी लौंग। कॉलेज गोइंग लड़कियों से लेकर शादीशुदा महिलाओं तक सभी इसे रोज पहन सकती हैं। कई डिजाइन में इसमें देवी लक्ष्मी की छोटी मूर्ति भी बनी होती है।

नथ का सफर 4000 साल पहले मध्य-पूर्व के कबीलों से शुरू होकर भारतीय दुल्हनों के सोलह श्रृंगार तक पहुंचा है। ये सिर्फ सोने-हीरे का टुकड़ा नहीं है, बल्कि हमारी परंपरा, आस्था, औरत की पहचान और उसके आत्मविश्वास का प्रतीक है। चाहे वो फिल्मों में फैशन स्टेटमेंट के तौर पर हो या किसी दादी की तिजोरी में रखा खानदानी गहना, नथ ने हर दौर में खुद को साबित किया है। ये हमें याद दिलाती है कि परंपरा कभी पुरानी नहीं होती, बस उसका अंदाज बदल जाता है। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।