अगर कोई एक कमरे में 24 घंटे रहने के लिए कह दें, तो हमारा जवाब न होगा। मगर क्या आप कल्पना कर सकती हैं कि, एक महिला जिसके पति ने उसे 15 साल तक बिना खिड़की वाले कमरे में बच्चे के साथ कैद कर दिया हो। यह सोचकर ही डर लगता है, पर आपको यह सच है। हम बात कर रहे हैं छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले की रहने वाली सोनाबाई रजवार की। इनकी कहानी संघर्ष, धैर्य और अटूट हौसले की एक बेमिसाल उदाहरण है। कम उम्र में शादी फिर यह सजा। हालांकि, इन्होंने इन सारी चीजों के बावजूद हार नहीं मानी और एक ऐसी आर्ट स्टाइल का इजाद किया, जिसके लिए उन्हें राष्ट्रीय सम्मान भी मिला। आज हम इसे लेख में सोनाबाई के बारे में बताने जा रहे हैं।

14 साल की उम्र में सोनाबाई रजवार की शादी

सोनाबाई की शादी बहुत कम उम्र में होलिराम रजवार से हुई थी, जो उनसे काफी बड़े थे। पति के संयुक्त परिवार की संपत्ति बंटने के बाद, वह उनके साथ पुहपुत्रा गांव में एक नए, अलग-थलग घर में रहने चली गईं, जो घने जंगलों से घिरा हुआ था। उनके पति ने उन पर घर के अंदर ही रहने की सख्त पाबंदी लगा रखी थी।

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हारने के बजाय सोनाबाई ने मिट्टी को बनाया सहारा

इस हालत से निराश होने के बजाय, सोनाबाई ने अंधेरे में भी अपना सहारा ढूंढ लिया। अपने छोटे बेटे का मन बहलाने और अपनी जिंदगी के खालीपन को भरने के लिए वह कमरे के किनारे और दीवार से मिट्टी खोदकर वे आकृतियां बनाने लगीं। उन्होंने जो काम बच्चे के लिए साधारण खिलौने बनाने से शुरू हुआ था, वह जल्द ही एक रचनात्मक जुनून में बदल गया।

1983 में बदली सोनाबाई की किस्मत

साल 1983 में जब भोपाल के भारत भवन के शोधकर्ताओं की एक टीम अचानक उनके गांव पहुंची। इसके बाद सोनाबाई की कला को अलग स्तर पर पहचान मिलीं। इससे पहले उनका हुनर सिर्फ एक घर के अंदर था। इसके बाद उनकी यह कला न केवल राष्ट्रीय स्तर बल्कि उनकी कृतियों की प्रदर्शनी भारत के अलावा अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी लगी। सोनाबाई की रजवार भित्ति चित्र के लिए उन्हें राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खूब सराहा गया। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा उन्हें प्रतिष्ठित तुलसी सम्मान से भी नवाजा। इसके साथ ही, कला के क्षेत्र में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार भी प्रदान किया गया था।

सोनाबाई का 77 साल की उम्र में निधन

सोनाबाई का साल 2007 में 77 साल की उम्र में निधन हो गया। आज, उन्हें छत्तीसगढ़ में समकालीन लोक कला की एक खास शैली यानी मिट्टी की कला की अगुआ के तौर पर सम्मान दिया जाता है। उनका घर इंसानी हिम्मत और जज्बे की एक बड़ी मिसाल है।

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सोनाबाई राजवार की कहानी हमें हिम्मत देती है कि बुरे से बुरे हालात में हमें हार नहीं माननी चाहिए। अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।

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