ओडिशा का ओडिसी नृत्य भारत के पुराने और शास्त्रीय नृत्यों में से एक है। इस नृत्य की शुरुआत प्राचीन समय में ओडिशा के मंदिरों से हुई थी, जहां देवदासिया, जिन्हें महारी कहा जाता था। वे भगवान जगन्नाथ की भक्ति में यह नृत्य किया करती थीं। इस नृत्य की खासियत इसकी त्रिभंग मुद्रा, सुंदर चेहरे के भाव और थिरकन है। आज के इस लेख में हम आपको इस नृत्य की उत्पत्ति और साक्ष्य के बारे में बताने जा रहे हैं।

ओडिसी नृत्य का जन्म कैसे हुआ?

किसी भी लोकगीत या लोकनृत्य को जब हम सुनते या फिर देखते हैं, तो पहला ख्याल यह आता है कि इसकी उत्पत्ति कैसे हुई? यही प्रश्न ओडिशा के शास्त्रीय नृत्य को लेकर भी आता है? बता दें कि ओडिसी नृत्य की शुरुआत लगभग 2000 वर्ष पहले ओडिशा के मंदिरों से मानी जाती है। इस कारण से यह भारत के सबसे प्राचीन शास्त्रीय नृत्यों में से एक है।

अन्य भारतीय शास्त्रीय नृत्यों की तरह, ओडिसी नृत्य भी मंदिरों में भगवान की पूजा का एक मुख्य माध्यम हुआ करता था। मान्यता है कि यह नृत्य देवी-देवताओं की लीलाओं से प्रेरित है। भगवान शिव का तांडव और भगवान विष्णु के मोहिनी रूप का प्रभाव नर्तकों के हाव-भाव और मुद्राओं में साफ दिखाई देता है।

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ओडिसी नृत्य के साक्ष्य कहां देखने को मिलते हैं?

ओडिशा के शास्त्रीय नृत्य का प्रमाण कोणार्क के प्रसिद्ध सूर्य मंदिर की दीवारों पर नर्तकियों की अलग-अलग मुद्राओं में उकेरी गई सुंदर मूर्तियां आज भी इस प्राचीन नृत्य शैली का प्रमाण हैं। इसका साक्ष्य उदयगिरि की हाथीगुम्फा और मंचपुरी गुफाओं में पहली और दूसरी शताब्दी ईसा पूर्व के पत्थरों पर लिखे लेख मिले हैं, जो यह साबित करते हैं कि यह नृत्य कितना पुराना है।

ओडिसी नृत्य और गीत गोविंदम का खास है संबंध

पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान जगन्नाथ को कवि जयदेव द्वारा रचित गीत गोविंदम के सुंदर और मधुर गीत सुनना बेहद पसंद था। भगवान को प्रसन्न करने के लिए पुरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर में उनके सामने रोज गीत गोविंदम के इन गीतों और छंदों का पाठ किया जाता था। यही कारण है कि ओडिसी नृत्य के पीछे बजने वाले संगीत और भजनों का मुख्य आधार गीत गोविंदम की इन्हीं पंक्तियों और छंदों से तैयार हुआ। ओडिसी नृत्य नाटकों को खास और समृद्ध बनाने में ओडिशा के प्राचीन और समृद्ध शास्त्रीय साहित्य का बहुत बड़ा योगदान रहा है।

ओडिसा नृत्य का पुरुषों से भी है खास

जब भी किसी नृत्य के बारे में बात करते हैं, तो दिमाग में कन्या की तस्वीर उभर आती है। बता दें कि इस युग में ओडिशा नृत्य महिला महारी नर्तकियों द्वारा किया जाता था, जो मंदिर की नर्तकियां थीं और जिन्होंने अपना जीवन देवताओं की सेवा में समर्पित कर दिया था। वहीं उत्सव स्थलों या मंदिरों के बाहर सड़कों पर पुरुष नर्तक नृत्य करते हैं, जिन्हें गोतिपुआ कहा जाता था। 20वीं शताब्दी के मध्य में ओडिसी नृत्य में गोतिपुआओं की अहम भूमिका थी।

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ओडिसा नृत्य की उत्पत्ति कैसे हुई इसके बारे में यकीनन आपको जानकारी मिल गई होगी। साथ ही अगर आपको यह आर्टिकल पसंद आया है तो इसे शेयर करें। ऐसे आर्टिकल को पढ़ने के लिए जुड़े रहे हरजिंदगी के साथ।

Image Credit- https://odishatourism.gov.in/