आज अगर हम आजाद भारत में सांस ले रहे हैं...हमारा झंडा गर्व से आसमान में लहरा रहा है, तो इसके पीछे न जाने कितने स्वतंत्रता सैनानियों का बलिदान और उनका जोश रहा है। आजादी की लड़ाई में पुरुषों के साथ महिला क्रांतिकारियों ने भी बढ़-चढ़कर हिस्सा लिए थे। किसी ने देश के लिए अपनी जान न्यौछावर कर दी, तो किसी ने पूरी हिम्मत के साथ ब्रिटिश शासन के खिलाफ आवाज बुलंद की। ऐसी ही एक महिला थीं भीकाजी रुस्तम कामा, जिन्हें मैडम कामा भी कहा जाता था। यूं तो वह विदेश में रहती थीं, लेकिन वहां रहकर भी उन्होंने भारत की आजादी की अलख जगाई। उन्हें 'भारतीय क्रांति की माता' भी कहा जाता है। चलिए उनके बारे में जानते हैं।

कौन थीं भीकाजी कामा ?

भीकाजी कामा का जन्म 24 सितंबर 1861 में एक पारसी परिवार में हुआ था। उनके पिता उस वक्त के एक बड़े वकील और नामी बिजनेसमैन थे। भीकाजी को भी बचपन से समाज से जुड़े कामों में काफी दिलचस्पी थी। वह आगे चलकर वकील बनीं। साल 1885 में उनकी शादी रुस्तम के.आर. से हुई थी। उनके पति भी वकील थे। हालांकि, कहा जाता है कि दोनों कि सोच काफी अलग थी।

विदेश में जगाई आजादी की अलख

भीकाजी ने विदेश में रहकर देश की आजादी के लिए बहुत काम किए। उन्होंने पेरिस इंडियन सोसाइटी की शुरुआत की थी। साल 1906 से उन्होंने लंदन में रहना शुरू कर दिया था। वहां उनकी मुलाकात भारतीय क्रांतिकारी श्यामजी कृष्ण वर्मा, हरदयाल और वीर सावरकर से हुई। उन्होंने देशभक्ति पर आधारित किताबों के लिए लंदन में एक पब्लिकेशन हाउस शुरू किया था। वह क्रांतिकारियों की आर्थिक सहायत भी करती थीं और 'वंदेमातरम' नाम से एक क्रांतिकारी पत्रिका भी निकाली थी।

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विदेश में फहराया भारत का पहला झंडा

भीकाजी कामा ने 22 अगस्त, 1907 को जर्मनी के एक शहर स्टटगार्ट में भारत का झंडा फहराकर ब्रिटिश हुकूमत को चुनौती दी थी। ऐसा करने वाली वह पहली भारतीय महिला थीं। उस वक्त की रिपोर्ट्स के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि उन्होंने झंडा फहराने के बाद एक शानदार भाषण देते हुए कहा था, "देखो संसार के कॉमरेड्स ये भारत का झंडा है, इसे सलाम करो।"

भारत के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में लिखा जाता है उनका नाम

भीकाजी कामा का नाम भारतीय इतिहास के पन्नों में स्वर्णिम अक्षरों में लिखा जाएगा। उनके सम्मान में एक डाक टिकट भी जारी किया गया था। भारत में कई जगहों का नाम उनके नाम पर रखा गया है। साल 1936 में उनकी मृत्यु हो गई थी। बताया जाता है कि उनके आखिरी शब्द थे, "वंदेमातरम।"

 

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