डॉक्टर के पास बहुत भीड़ थी। आजकल तो किसी डॉक्टर से बिना अपॉइंटमेंट लिए मिलना ही मुश्किल है। शिवा को आए आधा घंटा हो गया था और अभी तक उसका नंबर नहीं आया था। दो मरीज और थे, उनके बाद उसका नंबर आना था। वह मोबाइल पर अखबार पढ़ रही थी और कनखियों से डॉक्टर की तरफ भी देखती जा रही थी कि कब उसके पास बैठी औरत उठे और अगला मरीज अंदर जाए। हालांकि दीवार पर नोटिस लगा था कि कृपया मोबाइल बंद रखें, मगर वहां बैठे लोगों के मोबाइल की घंटियां लगातार बज रही थीं। एक औरत फोन पर बात करते हुए जोर-जोर से हंस भी रही थी। शिवा एड़ी के दर्द से वैसे ही बहुत परेशान थी। दो हफ्ते से दवा खा रही थी, मगर अभी तक कोई आराम नहीं था।
सामने की छोटी गली में बड़ी-बड़ी गाड़ियों की इतनी भीड़ थी कि सड़क बनाने वाला देखता तो अपना माथा पीट लेता। उसने तो रिक्शे और स्कूटरों के लिए यह सड़क या गली बनाई होगी। उसे क्या पता था कि लोगों के पास इस गली में भी इतनी बड़ी-बड़ी लग्जरी कारें होंगी। एक से एक बड़ी कि आगे बढ़ना और पीछे हटना, दोनों ही मुश्किल। डॉक्टर के पास बैठी औरत जब इतनी देर बाद उठकर बाहर आई तो शिवा को उसकी आंखें, मोटे होंठ और चपटी नाक देखकर लगा कि वह उसे जानती है। कहीं वह विशाखा तो नहीं। उसने भी उसे एक नजर देखा और आगे बढ़ गई। शिवा को लगा कि उसे पुकारे, लेकिन वह औरत भी उसे पहचान नहीं पाई। क्या पता कोई और हो और एक बार की जगह कई बार सारी-सारी बोलकर माफी मांगनी पड़े। लेकिन अगर यह वही है, यानी विशाखा, तो यह तो बहुत पतली-दुबली थी और बहुत गोरी भी। अब तो रंग भी सांवला हो गया है। इसकी बड़ी आंखें और चमकता चेहरा। सब कहते थे कि अरे, वह तो किसी मॉडल जैसी सुंदर है। शिवा कई बार उन लोगों से असहमत होते हुए कहती थी, 'ये क्या बात हुई। कह तो ऐसे रहे हो कि जैसे मॉडल होना सुंदर होने का प्रमाण होता हो।'
अगर वह वाकई विशाखा है, तो उसके बदले चेहरे के बारे में शिवा लगातार सोचती रही। विशाखा से मिले कम से कम चालीस साल हो गए। हो सकता है कि वह विशाखा न हो। कोई और उस जैसी दिखती हो, लेकिन विशाखा की सुंदरता और उसका आकर्षण कहां गया। शिवा की बहन सुने तो कहे, उसकी बदली शक्ल के बारे में सोच रही है, तू खुद को भी कभी आईने में देख ले। शक्ल कितनी बदल गई है। उम्र किसी को छोड़ती है भला! लेकिन हमें दूसरों के चेहरे बदले हुए लगते हैं, अपने नहीं।
अचानक डॉक्टर के सहायक ने हमेशा की तरह आंख से इशारा किया, यानी उसका नंबर आ गया। शिवा ने डॉक्टर को सारा हाल बताया था। डॉक्टर ने ब्लड प्रेशर मापा था। दवा तैयार की थी, फिर अपने हाथ से एक डोज भी दी थी। डॉक्टर हमेशा अपने हाथ से सभी मरीजों को एक डोज खिलाता था। शायद मरीजों में अपने प्रति भरोसा कायम करने का उसका यह एक तरीका था। दवा लेकर चलने को हुई तो वह डॉक्टर से बोली, एक बात पूछनी थी।
डॉक्टर ने कहा, कहिए।
यह जो मैडम अभी गई हैं, इनका नाम जान सकती हूं?
नाम तो नहीं पता, मिसेज वर्मा हैं।
क्लीनिक से बाहर निकलते हुए शिवा को याद आया कि विशाखा ने वर्मा नाम के ही किसी आदमी से शादी की थी। कोकिल जब उससे मिलने आई थी तो उसने बताया था कि वह यहीं कहीं रहती है। कोकिल, उमेश की बहन। जब विशाखा बाहर निकल रही थी तो जाते हुए उसकी साड़ी का रंग शाम की नदी जैसा लगा था। अंधेरे से भरा। हल्का काला, नीला, बैंगनी। अंधेरे से उतरती छायाओं जैसा डर पैदा करता। आखिर शाम के वक्त कौन नदी के पास जाना चाहता है। सुबह जो पानी अठखेलियां करता दिखता है, वह शाम को कितना डराता है। नदी का हाहाकार-दूर रहो, दूर रहो। इसीलिए सारे मगरमच्छ, मछलियां, कछुए तक कहीं नीचे चले जाते हैं। चलो, आज उसने नहीं पहचाना तो फिर कभी मिलेगी, अगर यहीं रहती है तो। मगर शिवा तो इस इलाके में तीस साल से रहती है। आज तक इससे पहले विशाखा कभी नहीं मिली। यही समझ लो कि आज ही मिलना लिखा था। मगर यह मिलना तो शिवा के लिए एकतरफा ही था।
विशाखा के बारे में एक बार शिवा के पति ने भी कहा था, वह लड़की उन दिनों किसी मॉडल जैसी दिखती थी। उसके पति और विशाखा के भाई में दोस्ती थी। शिवा खूब हंसी थी, 'लगता है दिल आ गया था तुम्हारा। बुरा हो उमेश का कि वह उसे ले उड़ा था, उन दिनों। जिसको देखो वह विशाखा को मॉडल जैसी कहता था, जबकि मॉडलिंग से उसका दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं था।
विशाखा, शिवा को होम्योपैथ के पास मिली थी, इस बात को कई साल बीत गए। शिवा के दिमाग से भी विशाखा गायब हो गई। एक दोपहर पसीने से लथपथ, वह कुछ खरीदने एक दुकान पर पहुंची, तो पीछे से जो दिखी वह विशाखा थी। शिवा को लगा पुकारे कि नहीं। फिर शक हुआ कि क्या पता वह विशाखा है भी कि नहीं। मगर उसके मुंह से निकल ही गया, विशाखा।
वह मुड़ी और बोली, शिवा।अरे इतने दिन बाद भी पहचान लिया। शिवा ने हंसते हुए कहा तो वह बोली, तुमने भी तो।
हां यार, सन पचहत्तर के बाद यह पूरे चालीस साल कहां गए। दिल्ली में रहते हुए भी ऐसा क्या हुआ कि कभी नहीं मिले। कहां रोज मिलते थे। विशाखा हंसकर बोली, यहां रहते हुए भी मुझे तैंतीस साल हो गए। और तुम्हें?
मुझे भी। जब यह सोसाइटी बनी थी, तभी आ गए थे। यह तो और भी मजेदार है, इतने वर्षों से पड़ोस में रहते हुए भी कभी आते-जाते, सड़क पर, दुकान में, किसी रेस्तरां में, बृहस्पति बाजार में कहीं तो नहीं मिले, विशाखा खिलखिलाकर बोली। सच में, कई बार तो इसे ही किस्मत कहते होंगे। जिससे जब मिलना लिखा होता है, तभी मिलते हैं, शिवा भी हंसी। विशाखा ने पता और फोन नंबर भी लिया। घर-परिवार के बारे में भी बात हुई। उसने बच्चों के बारे में पूछा। तो शिवा भी पूछ बैठी। वह बोली, एक बेटी गरिमा।
अच्छा एक ही बेटी है। नहीं बेटा भी था।
था माने? दो साल पहले एक एक्सीडेंट में डेथ हो गई। ये कहते ही उसकी आंखें एक गहरे दुख में डूब गईं।
यह कहानी पूरी तरह से कल्पना पर आधारित है और इसका वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं है। यह केवल कहानी के उद्देश्य से लिखी गई है। हमारा उद्देश्य किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचाना नहीं है। ऐसी ही कहानी को पढ़ने के लिए जुड़े रहें हर जिंदगी के साथ।
लेखक- क्षमा शर्मा Image credit- gemini, anjani reddy
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