कोरोना महामारी और लॉकडाउन के उस कठिन दौर ने हम सभी की जिंदगी बदल कर रख दी थी। वर्क फ्रॉम होम कर रहे माता-पिता के लिए अपने काम के साथ-साथ छोटे बच्चों की सही परवरिश और उन्हें व्यस्त रखना एक बहुत बड़ी चुनौती बन गया था। स्कूल बंद होने से बच्चे घरों में कैद हो गए, जिससे उनका स्वभाव चिड़चिड़ा और मोबाइल पर निर्भरता बढ़ने लगी। ऐसी स्थिति में धैर्य और सूझबूझ के साथ बच्चों की दिनचर्या में सुधार लाना बेहद जरूरी हो जाता है। आइए जानते हैं एक माँ के अपने व्यक्तिगत अनुभवों से कि कैसे सही समय प्रबंधन और रचनात्मक गतिविधियों के जरिए बच्चों को घर पर व्यस्त रखा जा सकता है...
जब मेरी बेटी आद्या डेढ़ साल की थी, तभी से मैंने उसे प्ले स्कूल के टोडलर्स ग्रुप में भेजना शुरू कर दिया था क्योंकि मुझे ऐसा लगता है कि हमउम्र दोस्तों के बीच रहकर खेल-खेल में बच्चे बेहतर ढंग से सीखते हैं। फिर मार्च 2020 के बाद एक दौर ऐसा भी आया, जब अचानक लोगों की जिंदगी थम सी गई। जहां माता-पिता घर से ऑफिस का काम करने लगे, वहीं स्कूल बंद होने के कारण बच्चे अपने घरों में कैद हो गए। तब मेरी बेटी ढाई साल की हो चुकी थी। पति माइक्रोसॉफ्ट कंपनी में इंजीनियर हैं और मैं अपने स्टार्टअप पर काम करती हूं।
आद्या बहुत डिमांडिंग हो गई
उन दिनों हम दोनों ने यह महसूस किया कि आद्या बहुत डिमांडिंग हो गई थी। हमारा ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए वह खूब शरारतें करने लगी थी। वह हमेशा यही चाहती थी कि मम्मी-पापा और दादा-दादी उसके साथ रहें। इसके अलावा उसने मोबाइल के साथ ज्यादा वक्त बिताना शुरू कर दिया था। यह आदत आंखों के लिए बहुत नुकसानदेह होती है, इसलिए मैंने सचेत ढंग से उसकी दिनचर्या में सुधार लाने का निर्णय लिया।
मिलजुलकर निभाई जिम्मेदारी
प्रोफेशनल जिम्मेदारियों के साथ हमारे लिए यह भी बहुत जरूरी था कि हम अपनी बेटी को अच्छी परवरिश दें। इसलिए उसके दादा-दादी के साथ बातचीत करके हमने यह तय किया कि हम चारों बारी-बारी से आद्या के साथ खेलने और बातचीत के लिए समय निकालेंगे। फिर दिन में दादा-दादी उसे कहानियां सुनाते, ड्राइंग बनाना और कलरिंग करना सिखाते थे। शाम को जब हम दोनों अपने काम से फ्री हो जाते, तो उसके साथ कई तरह के गेम्स खेलते, जिसके बहाने हम उसे रोचक ढंग से अक्षरों, अंकों और शब्दों को पहचानना सिखाते थे।
घर पर ही स्कूल जैसा आकर्षक माहौल बनाकर हम उसकी पढ़ाई पर भी पूरा ध्यान देने लगे। हमारे लिए डीआईवाई (डू इट योरसेल्फ) का तरीका बहुत मददगार साबित हुआ। मैं उसके लिए आइसक्रीम स्टिक, रंग-बिरंगे पेपर्स और पेन-पेंसिल लेकर आई। इसके बाद उसकी कल्पना जैसे ऊंची उड़ान भरने लगी और वह मेरे साथ मिलकर अपने कमरे को सजाने के लिए बहुत कुछ बनाने लगी। उसका स्क्रीन टाइम घटाने के लिए हम रोजाना उसके साथ लूडो, कैरम के अलावा कई मजेदार बोर्ड गेम्स खेलते थे।
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बदलने लगीं आदतें
अपने परिवार में हमने यह नियम बना लिया था कि ऑनलाइन क्लासेस खत्म होने के बाद हम आद्या को सिर्फ एक घंटे के लिए मोबाइल देखने की अनुमति देंगे। भले ही वह स्कूल नहीं जा रही थी, फिर भी रात को सही समय पर डिनर देकर हम उसे सुला देते थे, ताकि सुबह वह जल्दी उठ सके। जब उसकी दिनचर्या व्यवस्थित हो गई, तो उसने अपने आप मोबाइल देखना कम कर दिया। हम खुद भी उसके लिए कुछ ऐसे रोचक गेम्स तैयार करते, जिससे उसे कुछ नया सीखने का मौका मिले। आजकल वह पौधों को पानी देने और खेलने के बाद अपने सारे खिलौने समेटकर सही जगह पर रखने जैसे छोटे-छोटे घरेलू कार्यों में बड़ी खुशी के साथ हमारी मदद करती है। अब तो आद्या साढ़े पांच साल की हो चुकी है और वह जल्द ही स्कूल जाना शुरू कर देगी।
अपने अनुभवों के आधार पर मैं यही कह सकती हूं कि बच्चों के लिए समय निकालना बहुत जरूरी होता है।
परवरिश के 5 नियम
- बच्चों को पर्याप्त समय दें।
- स्क्रीन टाइम घटाएं।
- घरेलू कार्यों में उनसे मदद लें।
- क्रिएटिव एक्टिविटीज में व्यस्त रखें।
- थोड़ी आजादी भी दें।
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Images: magnific/sakhi
