कुछ गाने ऐसे होते हैं जिन्हें सुनते ही मन थोड़ा शांत सा हो जाता है। उनकी धुन यानी म्यूजिक सीधे दिल को छू जाती है। रणवीर सिंह की फिल्म 'लुटेरा' का गाना 'मोंटा रे' भी कुछ ऐसा ही है। यह गाना जब रिलीज हुआ था तो लोगों को काफी पसंद आया था। पहली बार सुनने पर शायद आपको लगे कि यह तो नॉर्मल एक हिंदी गाना है, लेकिन इसकी धुन और अंदाज के पीछे बंगाल की पुरानी लोक संगीत परंपरा की झलक मिलती है।
खास बात यह है कि इस संगीत की जड़ें करीब 500 साल पुरानी परंपरा से जुड़ी हैं। हम जिस गाने की बात कर रहे हैं, वो 'मोंटा रे' है। इस गाने में बाउल संगीत का असर सुनाई देता है। यही वजह है कि गाने की धुन दिल को छूने वाली लगती है। आइए इसके बारे में जानते हैं-
500 साल पुरानी है बाउल संगीत की परंपरा
आपको बता दें कि बाउल संगीत को बंगाल की पुरानी लोक संगीत परंपराओं में गिना जाता है। इसका इतिहास करीब 15वीं या 16वीं शताब्दी का है। इस संगीत पर बंगाल के वैष्णव और भक्ति आंदोलन का गहरा असर रहा है। बाद में 19वीं सदी में लालन फकीर ने बाउल संगीत को नई पहचान दी थी। यहां तक कि रवींद्रनाथ टैगोर भी इससे इतने इम्प्रेस थे कि उनकी रचनाओं में इसकी झलक साफ दिखती है। बाउल संगीत सिर्फ एक लोकगीत नहीं, बल्कि एक खास फिलॉसफी है।
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आखिर क्या है बाउल संगीत?
बाउल संगीत की सबसे खास बात है इसका मैसेज। यह बाहर मंदिर-मस्जिद में भगवान ढूंढने के बजाय अपने अंदर झांकने की बात करता है। यह किसी एक धर्म या जात-पात में बिल्कुल यकीन नहीं रखता है। पुराने समय में बाउल गायक गांव-गांव घूमकर गाना गाते थे और अपने गीतों से लोगों को जिंदगी और भक्ति का सही मतलब समझाते थे। एकतारा और मंजीरा जैसे सिंपल इंस्ट्रूमेंट्स की धुन इन गानों पर सुनने को मिलती थी, जिससे दिल को सुकून मिलता था।
आसान शब्द, लेकिन मतलब गहरा
बाउल गीतों की सबसे बड़ी खासियत यही है कि इसके लिरिक्स एकदम सिंपल होते हैं, जिन्हें कोई भी आसानी से समझ सकता है, लेकिन इन साधारण शब्दों के पीछे जीवन का बहुत गहरा मतलब छिपा होता है। ये गाने आपको अपने अंदर झांकने और खुद को समझने के लिए इंस्पायर करते हैं, इसीलिए सीधे दिल को छू जाते हैं। वहीं, इनकी रिलैक्सिंग ट्यून मन को एक अलग ही सुकून देती है।
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'मोंटा रे' में कैसे सुनाई देता है बाउल संगीत?
लुटेरा फिल्म का 'मोंटा रे' गाना इस पुरानी बाउल संगीत परंपरा को मॉडर्न अंदाज में सामने लेकर आया था। अमिताभ भट्टाचार्य के दिए हुए लिरिक्स हों या गाने की ट्यून, इस पर बाउल म्यूजिक का साफ असर दिखाई देता है। गाने की लाइन 'कागज के दो पंख लेके उड़ा चला जाए रे' मन को एक परिंदे की तरह उड़ने का अहसास कराती है। बहुत ही सिंपल शब्दों में मन और उसकी उलझनों को समझाना, यही तो बाउल गीतों का असली स्टाइल और पहचान है।
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'मोंटा रे' गाने और बाउल म्यूजिक से जुड़े कुछ खास फैक्ट्स
मोंटा रे गाने और बंगाल के बाउल म्यूजिक के बारे में आपको ये बातें जान लेनी चाहिए-
- यह खूबसूरत गाना रणवीर सिंह की फिल्म 'लुटेरा' का है, जिसे अमिताभ भट्टाचार्य ने लिखा है।
- मोंटा रे गाने में बंगाल के ट्रेडिशनल बाउल संगीत की बहुत प्यारी झलक मिलती है।
- बाउल संगीत की शुरुआत 15वीं-16वीं सदी से मानी जाती है, जिस पर भक्ति और वैष्णव आंदोलन का गहरा असर रहा।
- इस संगीत में एकतारा और मंजीरा जैसे सिंपल इंस्ट्रूमेंट्स का इस्तेमाल होता है।
- UNESCO ने बाउल संगीत को इंसानियत की 'अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' (Intangible Cultural Heritage) की लिस्ट में शामिल किया है।
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