अक्सर आपने देखा होगा कि बिजी लाइफ में सोशल मीडिया पर सैकड़ों दोस्तों और घर में भरे-पूरे परिवार से घिरे के बावजूद, कई बार हम खुद को बिल्कुल अकेला और उदास महसूस करते हैं। यह एक ऐसी स्थिति है जिसे 'क्रोनिक लोनलीनेस' या भावनात्मक अकेलापन भी कहते हैं। हमें पता होना चाहिए कि किसी के पास लोगों का होना और किसी के साथ जुड़ाव महसूस करना, दोनों में बहुत बड़ा अंतर है। ऐसे में अपनों के बीच रहकर भी यह अकेलापन क्यों सताता है और इससे कैसे बाहर निकला जाए? इसके बारे में पता होना जरूरी है। इसके लिए हमने कोच, हीलर, लाइफ अल्केमिस्ट और साइकोथेरेपिस्ट डॉ. चांदनी तुगनैत (Dr. Chandni Tugnait) से भी बात की है। जानते हैं आगे...

अपनों के बीच भी अकेलापन क्यों महसूस होता है?

भीड़ में अकेलेपन की भावना अचानक नहीं आती, कई बार हमारे आसपास लोग तो बहुत होते हैं, लेकिन उनसे हमारा रिश्ता सिर्फ हाय-हेलो तक का होता है। ऐसे में हम अपना डर या खुशियां उनसे शेयर नहीं कर पाते। 

कभी-कभी हमें लगता है कि परिवार या दोस्त हमारी मानसिक स्थिति या सोच को नहीं समझेंगे और मजाक उड़ाएंगे तब भी हम खुद को समेट लेते हैं। बता दें कि कुछ लोग ऐसे होते हैं जो इंटरनेट की दुनिया में दूसरों की परफेक्ट लाइफ देखकर अपनी तुलना उनसे करने लगते हैं। यह डिजिटल जुड़ाव हमें असल जिंदगी के रिश्तों से दूर कर देता है। हम अपनी ही दुनिया में कहीं खो जाते हैं और आस-पास क्या हो रहा होता है, हमें पता ही नहीं चलता।

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इस अकेलेपन से कैसे निपटें?

  • बता दें कि अपनों के साथ सिर्फ एक कमरे में बैठना काफी नहीं है। फोन को एक तरफ रखकर उनसे दिल खोलकर बातें करना भी बेहद जरूरी है।
  • आप कमजोरियों और उदासी को न छिपाएं बल्कि एक ऐसे भरोसेमंद इंसान से बात करें जो आपकी बात को बिना जज किए सुन सके।
  • इससे अलग आप अकेलेपन और एकांत में फर्क समझें। अपनी हॉबीज, जैसे- किताबें पढ़ना, संगीत सुनना या गार्डनिंग में मन लगाएं ताकि आपको अकेले रहने में भी खुशी मिले।

एक्सपर्ट की राय

एक्सपर्ट्स की राय है कि सबसे पहले खुद को स्वीकारें। अगर परिवार या दोस्तों के बीच तालमेल बिठाने में परेशानी आए तो जबरदस्ती भीड़ में घुसें। रिश्तों की संख्या पर न ध्यान देकर उनकी गहराई को समझें। साथ ही बिना किसी झिझक के किसी थेरेपिस्ट या काउंसलर की मदद जरूर लें।

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Images: magnific