प्रकृति के रूल्स हमारी डेली लाइफ को इतनी आसानी से चलाते हैं कि हमारा ध्यान इस पर कभी जाता ही नहीं। दिन और रात के हिसाब से सोना और जागना जैसी आदतें नेचुरली चलती रहती हैं। अगर इसमें थोड़ा सा भी बदलाव हो जाए, तो लोग परेशान हो जाते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि हमें रात को ही अच्छी नींद क्यों आती है, सुबह-शाम पक्षी क्यों चहचहाते हैं, या कुछ फूल सुबह या शाम को ही क्यों खिलते हैं? इस बारे में गुरुग्राम के प्रतीक्षा हॉस्पिटल की डॉक्टर (डॉ. प्रतिभा डोगरा) ने विस्तार से बताया है। आइए इसके बारे में जानते हैं...

बॉडी क्लॉक क्या है?

बॉडी क्लॉक के काम करने के तरीके को आप ऐसे समझ सकते हैं कि हर जीव (लिविंग स्ट्रक्चर) के अंदर एक ऐसा नेचुरल सिस्टम होता है, जो उनके सोने और जागने जैसी डेली एक्टिविटीज का टाइम सेट करता है। वास्तव में, इंसान और सभी जीव-जंतुओं के ब्रेन के हाइपोथैलेमस नाम के हिस्से में लगभग 20,000 न्यूरॉन्स होते हैं। ऑप्टिक नर्व से इन न्यूरॉन्स का डायरेक्ट कनेक्शन होता है और वहीं से इन्हें सिग्नल मिलते हैं। सुबह सूरज की रोशनी पड़ते ही ये एक्टिव हो जाते हैं।

सर्काडियन रिदम को समझें

जब हमारी बॉडी क्लॉक आसपास के माहौल के हिसाब से खुद को ढाल लेती है, तो इस प्रोसेस को सर्काडियन रिदम (Circadian Rhythm) कहते हैं। यह हमारे सोने-जागने के टाइम, खाने-पीने की आदतों, डाइजेशन और हॉर्मोन्स के रिलीज होने पर असर डालती है। बॉडी क्लॉक की स्पीड ज्यादा तेज या धीमी होने से शरीर का यह नैचुरल बैलेंस बिगड़ जाता है। इसकी वजह से नींद न आना, मोटापा, डायबिटीज, डिप्रेशन और मूड स्विंग्स जैसी शारीरिक और मानसिक परेशानियां हो सकती हैं।

बॉडी का बैलेंस बिगड़ने न दें

नींद का रूटीन खराब होने से बॉडी क्लॉक का बैलेंस बिगड़ जाता है, जिसका सीधा असर सेहत पर पड़ता है। जैसे एयरलाइंस में काम करने वाले लोग जो बार-बार अलग-अलग देशों की यात्रा करते हैं, उनकी बॉडी क्लॉक हर बार बदलते टाइम जोन के हिसाब से तुरंत सेट नहीं हो पाती। इसकी वजह से उन्हें नींद से जुड़ी प्रॉब्लम्स होने लगती हैं। दिन के टाइम सुस्ती आना और सिरदर्द होना इसके आम लक्षण हैं, जिसे जेटलैग कहा जाता है।

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सेहत पर नकारात्मक प्रभाव

अगर दिनचर्या बॉडी क्लॉक के विपरीत हो तो पाचन तंत्र पर इसका सबसे बुरा असर पड़ता है। मिसाल के तौर पर शरीर की घड़ी के अनुसार डिनर का समय शाम सात से आठ बजे के बीच होता है, लेकिन जब कोई व्यक्ति देर रात को कुछ खाता है तो इससे उसका दिमाग भ्रमित हो जाता है और वह पैंक्रियाज को भोजन पचाने वाले एंजाइम के स्राव का निर्देश नहीं देता। इससे पाचन क्रिया सही ढंग से काम नहीं कर पाती और शरीर में फैट का संग्रह होने लगता है, जिससे व्यक्ति को मोटापे की समस्या होती है।

यह भी जानें

जितना हो सके सूरज की रोशनी में वक्त बिताएं, इससे आप पूरे दिन एक्टिव और तरोताजा महसूस करेंगे।

  • सुबह 5 से 6 बजे का समय: इस दौरान शरीर में एनर्जी और स्ट्रेस को कंट्रोल करने वाला हॉर्मोन (कोर्टिसोल) एक्टिव हो जाता है, जिससे हमारी नींद खुलती है। इस समय जॉगिंग, तेज चलना (ब्रिस्क वॉक) या एक्सरसाइज करना सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होता है।
  • सुबह 7 से 8 बजे का समय: इस समय ब्लड प्रेशर में तेजी से बदलाव आता है, जिससे हार्ट अटैक या स्ट्रोक का खतरा सबसे ज्यादा रहता है। इसलिए हाई बीपी के मरीजों को इस वक्त ऐसा कोई भी काम नहीं करना चाहिए, जिससे उनका बीपी बढ़े।
  • 8 घंटे की नींद क्यों जरूरी है? दिनभर में हम जो भी नया सीखते या करते हैं, नींद के दौरान हमारा दिमाग उसे हिप्पोकैंपस (Hippocampus) नाम के हिस्से में सेव (Store) करता है। इसलिए अपनी मेमोरी (याददाश्त) को मजबूत रखने के लिए रोजाना 8 घंटे की नींद जरूर लें।

लेखक- विनीता

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