आज मैं आपसे एक सवाल पूछना चाहती हूं। क्या हम महिलाएं, इस देश की आधी आबादी, अपने पैसों के मामले में भी सच में आजाद हैं?
यह सवाल मैं किसी आरोप की तरह नहीं पूछ रही। मैं यह इसलिए पूछ रही हूं क्योंकि जवाब जानना ज़रूरी है।
हमारे घरों में एक पुरानी परंपरा है। जब कोई बड़ा फैसला होता है, चाहे ज़मीन की बात हो, बैंक की बात हो, या निवेश की , तो महिला से कहा जाता है, "तुम चाय लेकर आओ।" बातचीत होती है, फैसले होते हैं, दस्तावेज़ों पर दस्तखत होते हैं। और महिला चाय लेकर आती है, मुस्कुराती है, और लौट जाती है।
यह एक मासूम परंपरा लगती है। लेकिन यह मासूम नहीं है।
क्योंकि इस एक छोटी सी परंपरा में एक बहुत बड़ा संदेश छिपा है: यह तुम्हारे लिए नहीं है। यह मामला तुम नहीं समझोगी। तुम्हारी ज़रूरत यहां नहीं।
और हम पीढ़ी दर पीढ़ी यह मान भी लेती हैं।
हम अपने बेटों को कहते हैं, "जाओ, खुद सीखो, गलतियां करो, संभालो।" और अपनी बेटियों को कहते हैं, "तुम्हें इसकी क्या ज़रूरत है, घर में कोई न कोई है जो देख लेगा।" हम बेटों को दुनिया में धकेलते हैं और बेटियों को घर में सुरक्षित रखते हैं। हमें लगता है कि हम उन्हें बचा रहे हैं। लेकिन जो बचाव हम सोचते हैं, वह दरअसल एक निर्भरता है जो उनके पूरे जीवन पर असर डालती है।
जो लड़की यह नहीं सीखती कि पैसा कैसे काम करता है, वह बड़ी होकर उस औरत बन जाती है जिसे अपने ही पैसों के लिए किसी और की मंज़ूरी चाहिए।
यह कमज़ोरी नहीं है। यह एक ऐसी परवरिश का नतीजा है जिसने उसे जानबूझकर इस ज्ञान से दूर रखा।
आर्थिक आज़ादी का मतलब सिर्फ कमाना नहीं है। बहुत सी महिलाएं कमाती हैं और फिर भी आर्थिक रूप से निर्भर हैं , क्योंकि उनकी कमाई किसी और के खाते में जाती है, किसी और के फैसले से खर्च होती है, और उनके भविष्य की योजना कोई और बनाता है। आर्थिक आज़ादी का मतलब है यह जानना कि आपके पास क्या है, यह समझना कि वह कहां है, और यह तय करना कि वह कहां जाएगा।
जब तक आप निवेश नहीं करतीं, आप पूरी तरह आज़ाद नहीं हैं।
यह कठोर बात लग सकती है। लेकिन सच है। क्योंकि निवेश सिर्फ पैसा बढ़ाने का ज़रिया नहीं है, यह यह घोषणा है कि मेरा भविष्य है, मेरी योजना है, और मेरा फैसला है। जब आप हर महीने अपने खाते से एक तय राशि एक म्यूचुअल फंड में डालती हैं, तो आप सिर्फ निवेश नहीं करतीं। आप यह कह रही होती हैं: मेरे पास एक भविष्य है जिसकी मुझे परवाह है, और मैं उसके लिए खुद ज़िम्मेदार हूं।
यही आर्थिक आज़ादी की शुरुआत है।
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79 साल पहले इस देश ने राजनीतिक आज़ादी का अध्याय लिखा था। वह अध्याय लाखों लोगों की कुर्बानियों से लिखा गया था। आज हम एक नया अध्याय लिख सकते हैं, हर घर में, हर महिला के लिए बिना किसी बड़ी कुर्बानी के। बस एक फैसले से। यह समझने से कि पैसा मेरा है, पैसे के बारे में फैसला भी मेरा होगा।
इसी सोच के साथ मैंने अपनी किताब 'मैं हूं अपनी धनलक्ष्मी' लिखी है।
चाय तो बाद में भी बन सकती है। पहले यह बातचीत ज़रूरी है।
क्योंकि जिस दिन हमारे पैसों का फैसला हमारा होगा, उसी दिन हमारी आज़ादी पूरी होगी।
हमें iamolaxmi@gmail.com पर लिखें। हम हर पत्र पढ़ते हैं।
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