आमतौर पर लोगों को ऐसा लगता है कि पेरेंट्स के लिए इकलौते बच्चे की परवरिश बहुत आसान होती है, पर वास्तव में ऐसा नहीं है। जिस परिवार में एक ही बच्चा होता है, वहां माता-पिता की जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं। मैं ग्यारह वर्षीय बेटे की मां और एक स्कूल में टीचर भी हूं। अपने बच्चे की परवरिश के दौरान मैं हमेशा इस बात का ध्यान रखती हूं कि उसे अकेलापन महसूस न हो। नोएडा की सीमा साही पेरेंटिंग से संबंधित कुछ ऐसे ही अनुभव आपके साथ शेयर कर रही हैं।
सिखाती हूं शेयरिंग
आमतौर पर इकलौते बच्चे दूसरों के साथ अपनी चीजें शेयर नहीं करना चाहते। मेरे बेटे आदि के साथ भी ऐसी ही समस्या थी। उसे शुरू से ही यह मालूम था कि घर में चॉकलेट और खिलौने सिर्फ उसी के लिए आते हैं, इसलिए वह शेयरिंग नहीं सीख पा रहा था। मैंने देखा कि जब कभी हमारे घर पर उसके हमउम्र बच्चे आते तो वह उनके साथ अपनी चीजें शेयर करने में थोड़ी आनाकानी करता था। जब वह चार साल का हो गया तो मुझे यह महसूस हुआ कि यह आदत ठीक नहीं है। इसलिए मैं रोजाना शाम को उसे पार्क में लेकर जाती, वहां खेल रहे बच्चों से उसकी दोस्ती करवाती। जब भी वह झूले के पास जाता तब मैं उसे अपनी बारी का इंतजार करना सिखाती। अब वह धीरे-धीरे शेयरिंग के साथ दूसरों की मदद करना भी सीख रहा है। लॉकडाउन के दौरान जब मैं जरूरतमंदों के लिए भोजन की व्यवस्था करती तब इस कार्य में वह भी मेरी मदद करता।
अपनाती हूं संतुलित व्यवहार
अगर घर में एक ही बच्चा हो तो उसके प्रति पेरेंट्स की जिम्मेदारियां बढ़ जाती हैं। अक्सर हमें दोस्त या भाई-बहन बनकर उसके साथ खेलना भी पड़ता है, ताकि उसे अकेलापन महसूस न हो, लेकिन जब उसने स्कूल जाना शुरू किया तब मैंने यह तय किया है कि अब उसे अनुशासित करना बहुत जरूरी है। अगर हम बच्चे के साथ हमेशा दोस्ताना व्यवहार करेंगे तो उसके मन में हमारे लिए सम्मान की भावना विकसित नहीं होगी, जिससे वह हमारी बातों को नजरअंदाज करने लगेगा। इसीलिए जब भी वह कुछ गलत करता है, तब हम उसे मना करने की वजह बताकर तुरंत टोकते हैं।
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हमने यह तय किया है कि उसकी हर मांग पूरी नहीं की जाएगी। मसलन, जब भी वह जंक फूड खाने की जिद करता है तो मैं उसे समझाती हूं कि यह सेहत के लिए ठीक नहीं है, इसलिए ऐसी चीजें हमेशा नहीं खानी चाहिए। उसे महीने में एक बार पिज्जा-बर्गर या नूडल्स खाने की छूट मिलती है। मुझे ऐसा लगता है कि अपने व्यवहार से बच्चों को यह एहसास दिलाना बहुत जरूरी है कि परिवार में अंतिम निर्णय लेने का अधिकार सिर्फ माता-पिता के पास होता है और वे बच्चों की भलाई के लिए ही उन्हें डांटते हैं, इसलिए उन्हें पेरेंट्स की हर बात माननी चाहिए।
परवरिश का पर्याय है धैर्य
मुझे ऐसा लगता है कि परवरिश का दूसरा नाम धैर्य है। इसके बिना बच्चे को अच्छे संस्कार देना असंभव है। इस बात की उम्मीद रखना गलत है कि समझाने या डांटने के तुरंत बाद बच्चे की आदतें सुधर जाएंगी। इसके लिए आपको थोड़ा इंतजार करना होगा। परवरिश एक ऐसी सतत प्रक्रिया है, जिसमें सकारात्मक सोच के साथ लगातार एक ही दिशा में प्रयास की जरूरत होती है, तभी कुछ समय बाद बच्चों के व्यवहार में सकारात्मक बदलाव नजर आता है।
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परवरिश के 5 नियम
- बच्चे के साथ रोजाना बातचीत करें।
- घरेलू कार्यों में सहयोग लें।
- उसे उसकी गलती का एहसास दिलाएं ।
- बच्चे से यह उम्मीद न रखें कि अचानक उसकी आदतें बदल जाएंगी।
- आप उसके रोल मॉडल बनें।
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Image Credit: Sakhi & Shutterstock
