भारत में कई ऐसे शहर हैं जिनकी अपनी एक अलग ही कहानी है। इनका नाम लेते ही एक खास पहचान और पुरानी कहानी याद आ जाती है। काशी, वाराणसी और बनारस भी ऐसे ही नाम हैं। आज भले ही सरकारी तौर पर इस शहर को वाराणसी कहा जाता है, लेकिन आम बोलचाल में बनारस नाम आज भी लोगों की जुबान पर सबसे आगे रहता है, लेकिन कई लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि आखिर एक ही शहर के इतने सारे नाम कैसे हो सकते हैं?

काशी का नाम वाराणसी क्यों पड़ा और फिर इसे बनारस क्यों कहा जाने लगा? दरअसल, इस शहर का इतिहास और इसके किस्से हजारों साल पुराने हैं। हालांकि शहर के नामों की कहानी भी अपने आप में काफी खास है। आज का हमारा लेख भी इसी विषय पर है। हम आपको काशी के नामों की दिलचस्प कहानी बता रहे हैं। आइए जानते हैं-

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सबसे पहले जानिए 'काशी' नाम का मतलब?

पुराने जमाने में बनारस को काशी कहा जाता था। काशी का मतलब होता है रोशनी या चमकने वाला शहर। यह नाम काशा शब्द से निकला है, जिसका मतलब उजाला होता है। इसके अलावा यह शहर भगवान शिव की प्रिय नगरी भी है और इसे उनका घर भी माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि यहां भगवान शिव और माता पार्वती रहते थे, इसलिए हिंदू धर्म में इस जगह की बहुत बड़ी और खास मान्यता है। हालांकि, यह शहर असल में कब और कैसे बसा था, इसकी पक्की जानकारी आज भी किसी के पास नहीं है।

फिर काशी का नाम 'वाराणसी' कैसे पड़ा?

अब आते हैं इस शहर के सबसे मशहूर नाम वाराणसी पर। दरअसल, इसका कनेक्शन शहर के पास बहने वाली दो छोटी नदियों से है-

  • वरुणा
  • अस्सी

शहर इन्हीं दोनों नदियों के बीच में बसा हुआ है। बस फिर क्या था, वरुणा और अस्सी दोनों को मिलाकर इसका नाम वाराणसी रख दिया गया। सीधी सी बात है पुराना नाम काशी था और जब ये दोनों नदियां जुड़ीं, तो नाम वाराणसी बन गया।

फिर 'बनारस' नाम कहां से आया?

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब शहर का नाम काशी और वाराणसी है, तो फिर बनारस नाम कहां से आ गया? गवर्नमेंट सोर्स में इस शहर को Benares नाम से भी पुकारे जाने की बात कही गई है। यानी वाराणसी को अक्सर लोग Benaras कहते आए हैं। हालांकि, यह नाम Benares से बदलकर बनारस कैसे बना, इसका भी कोई सोर्स नहीं मिला है, लेकिन यह बात बिल्कुल साफ है कि इस शहर की पहचान सिर्फ वाराणसी तक ही सीमित नहीं रही है। काशी और वाराणसी के साथ-साथ बनारस नाम भी बहुत लंबे समय से इस्तेमाल होता आ रहा है और आज आम बोलचाल में सबसे ज्यादा लोग बनारस ही बोलते हैं।

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हजारों साल पुराना है शहर का इतिहास

आपको बता दें कि वाराणसी से जुड़ी मान्यताएं करीब 10 हजार साल पुरानी हैं। इस शहर का जिक्र हमारे पुराने हिंदू ग्रंथों और महाभारत में भी मिलता है। हिंदू धर्म की जो सात सबसे पवित्र जगहें मानी जाती हैं, उनमें वाराणसी को सबसे खास दर्जा दिया गया है। सिर्फ हिंदू धर्म ही नहीं बल्कि जैन धर्म में भी इस शहर की बहुत मान्यता है। इसके अलावा बौद्ध धर्म को आगे बढ़ाने में भी इस जगह का बहुत बड़ा हाथ रहा है। वाराणसी से बस करीब 10 किलोमीटर दूर सारनाथ नाम की जगह है। यहीं पर भगवान बुद्ध ने अपना सबसे पहला उपदेश दिया था।

कभी काशी राज्य की राजधानी था यह शहर

इतिहास के पन्नों में इस शहर की बहुत बड़ी और खास जगह रही है। ईसा पूर्व छठी शताब्दी में यह शहर 'काशी राज्य' की राजधानी हुआ करता था। इसके बाद अपने धार्मिक विचारों को आगे बढ़ाने के लिए यहां कई बड़े संत और विद्वान आए। आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य भी वाराणसी आए थे और उन्होंने हि इसे भगवान शिव की पूजा का एक बहुत बड़ा केंद्र बनाने में अहम भूमिका निभाई थी।

आगे चलकर पहली शताब्दी में बनारस गहड़वाल वंश की राजधानी भी था। जैसे-जैसे समय बीता, शहर में नई-नई सड़कें बन गईं और हिंदू धर्म से जुड़े कई बड़े लोग यहां लगातार आते रहे।

मुगल और मराठा दौर में बदली वाराणसी की तस्वीर?

बताया जाता है कि मुगल बादशाह अकबर के समय वाराणसी में कला और संस्कृति को काफी बढ़ावा मिला था। अकबर ने शहर में भगवान शिव और विष्णु के दो बड़े मंदिर भी बनवाए थे। वहीं, इसके बाद 18वीं सदी में मराठा और ब्राह्मण राजाओं के राज में आज के वाराणसी के कई हिस्सों का विकास हुआ। इसके पहचान की बात करें तो साल 1737 में मुगलों ने बेनारेस (Benares) राज्य को आधिकारिक रूप से मान्यता दी। देश की आजादी तक यहां राजघराने से जुड़े काम होते थे और आजादी के बाद यह पूरी तरह से भारत का हिस्सा बन गया।

अब तो आपको काशी, वाराणसी और बनारस के नामों के बारे में जानकारी हो गई होगी। साथ ही अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।

Source- https://varanasismartcity.gov.in/about/explore-history

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