Poha History And Origin: सुबह के नाश्ते में जब बारी कुछ जल्दी बनाने की आती है, तो दिमाग में पहली इमेज पोहा की आती है। इसे बनाना बेहद आसान और कुछ ही मिनट में बनने वाली डिश है। मगर क्या आपको पता है कि जो पोहा आज गरीब से लेकर अमीर हर घर में बनाया जाता है, वह पहले गरीबों का खाना माना जाता है। हो सकता है कि मेरी तरह आपको यह बात अजीब लगे, लेकिन यह सच है। आज के इस लेख में हम आपको बताने जा रहे हैं कि फिर पोहा भारत का लोकप्रिय नाश्ता कैसे बना?

पोहा कैसे बनता है?

पोहा चपटे, पीसे हुए चावल के टुकड़ों से बनता है, जो अलग-अलग मोटाई में मार्केट में मिलता है। पतले पोहे का इस्तेमाल मुख्य रूप से चिवड़ा मुख्य रूप से नमकीन नाश्ता बनाने में किया जाता है , जिसमें भुनी हुई मूंगफली, किशमिश और मसाले डाले जाते हैं। वहीं मोटे पोहे का इस्तेमाल भारत के दक्षिणी भाग में ज्यादा होता है। इसे तेलुगु में अटुकुलु और कन्नड़ में अवलाक्की कहते हैं।

कृष्ण से जुड़ा है पोहा का इतिहास

पोहा का इतिहास भगवान कृष्ण और उनके परम मित्र सुदामा से जुड़ा हुआ है। सुदामा कृष्ण के बचपन के मित्र थे। कृष्ण बड़े होकर द्वारका के राजा बने, जबकि सुदामा और उनका परिवार गरीबी में जीवन व्यतीत कर रहे थे। कथा के अनुसार, एक दिन सुदामा की पत्नी गरीबी और दुख से तंग आकर उन्हें याद दिलाया कि द्वारका के स्वामी कृष्ण उनके बचपन के मित्र हैं और उन्हें कृष्ण से मिलने जाना चाहिए।

सुदामा इतने गरीब थे कि वे कोई महंगा उपहार नहीं दे सकते थे। ऐसे में उन्होंने कृष्ण के लिए मुट्ठी भर पोहा लिया, उसमें गुड़ मिलाया, उसे कपड़े में बांधा। हाथ में पोहा की गठरी लिए सुदामा कृष्ण से मिलने के लिए द्वारका की ओर पैदल चल पड़े।

कई दिनों के बाद, वे द्वारका पहुंचे। इसके बाद कृष्ण अपने प्रिय मित्र का स्वागत करने के लिए बांहें फैलाकर बाहर आए। इसके बाद अचानक, आंखों में चमक लिए कृष्ण ने सुदामा से उपहार मांगा। इस पर सुदामा ने पोहा का गट्ठा आगे बढ़ा दिया। इसे लेने के बाद कृष्ण बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, “पोहा, यह मेरा पसंदीदा भोजन है।” और उन्होंने तुरंत एक मुट्ठी पोहा खाया। यह जिक्र महाकाव्य महाभारत में है।

महाराष्ट्र और दक्षिणी पोहे में अंतर

महाराष्ट्रीयन और दक्षिण भारतीय पोहे में अंतर होता है। पहला अंतर रंग का है। महाराष्ट्रीयन पोहा आमतौर पर हल्दी के इस्तेमाल के कारण पीला होता है, जबकि दक्षिण भारतीय पोहा आमतौर पर सफेद होता है क्योंकि इसमें हल्दी नहीं डाली जाती। दूसरा अंतर यह है कि महाराष्ट्रीयन पोहे में जीरा डाला जाता है, जबकि दक्षिण भारतीय पोहे में सरसों डाली जाती है। महाराष्ट्रीयन लोग अपने खाने में चीनी की मात्रा भी अधिक डालते हैं। दक्षिण भारतीय लोग महाराष्ट्रीयन लोगों की तुलना में अपने व्यंजनों में करी पत्ते और ताजा कसा हुआ नारियल अधिक मात्रा में डालते हैं।

नेशनल आइकॉन बना पोहा

आज पोहा फाइव-स्टार होटलों के बुफे मेनू से लेकर कॉर्पोरेट कैफेटेरिया और स्ट्रीट वेंडर की ठेली तक एक जैसा सम्मान पाता है। अब यह इस बात का प्रतीक नहीं है कि आपकी जेब में कितने पैसे हैं बल्कि इस बात की पसंद बन चुका है कि आपको सुबह-सुबह कितना लाइट और टेस्टी नाश्ता चाहिए।

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Image Credit- Magnific