कुछ वर्ष पहले की बात है। एक सिंगर मित्र ने अरुणाचल प्रदेश की हरी-भरी वादियों में होने वाले म्यूजिक फेस्टिवल में साथ चलने का न्योता दिया था। वह उस फेस्टिवल में परफॉर्म करने वाली थीं। लेकिन किसी कारणवश तब जाना नहीं हो सका था। बाद में उस दोस्त की जुबानी फेस्टिवल की जो अद्भुत कहानियां सुनीं, उसने जिस तरह से जीरो घाटी की सुंदरतम तस्वीर मेरी आंखों के सामने खींची, उससे समय मिलते ही वहां जाने की बात पक्की हो गई थी। हालांकि, विगत दो वर्षों में बमुश्किल ही यात्राएं हो पाईं, लेकिन जहां भी जाना हुआ, उसमें जीरो घाटी एक थी...।
अपातिनी जनजाति से परिचय
अरुणाचल प्रदेश के लोअर सुबानसिरी जिले में समुद्रतल से 5500 फुट की ऊंचाई पर स्थित जीरो वैली एक पुराना और थोड़ा विचित्र-सा शहर है। यहां हरे-भरे बांस के जंगल, नीले और हरे रंग के देवदार के पेड़ों एवं पहाड़ों के बीच धान के खेत बरबस ही आपको मोह लेते हैं। यह घाटी जितनी अपने समृद्ध वन्यजीव के लिए जानी जाती है, उतनी ही लोकप्रिय यहां के निवासियों- 'अपातिनी जनजाति के लिए भी। बताते हैं कि इसी जनजाति ने घाटी में धान की खेती शुरू की और सिंचाई के लिए नालीनुमा नहरों के चैनल बनाए। अब आप सोच रहे होंगे कि आखिर इतना क्या खास है इस जनजाति में? आपने खेतों में महिलाओं को काम करते हुए तो कई स्थानों पर देखा होगा। लेकिन बांस की बनी नोज़ प्लग (यापिंग हुल्लो) पहने और माथे से ठोढ़ी तक टैटू बने हुए चेहरे वाली स्त्रियां कहीं और नज़र नहीं आई होंगी। सच कहूं तो उन्हें देखने के बाद अपनी नज़रों को हटाना आसान नहीं होता। हालांकि, 1970 के आसपास सरकार ने इस परंपरा पर प्रतिबंध लगा दिया था। बावजूद इसके, जीरो घाटी की बुज़ुर्ग स्त्रियां अपनी परंपरा का निर्वहन करते दिखाई दे ही जाती हैं। हमने जब कौतूहलवश एक स्थानीय गाइड से इस परंपरा के पीछे की कहानी जानने की कोशिश की, तो वह थोड़ी हृदयविदारक निकली। गाइड ने बताया कि घाटी की स्त्रियों की खूबसूरती उनकी असुरक्षा की वजह बन गई थी। पड़ोसी गांव के कबीले वाले उनका अपहरण कर लेते थे। उससे बचने के लिए ही स्त्रियों ने चेहरे के नैन-नक्श बदल डाले...।
सादगी एवं परंपराएं
जीरो घाटी का सबसे बड़ा आकर्षण उसकी नैसर्गिक सुंदरता है। यहां के निवासियों का सादगी पसंद जीवन और उनका प्रकृति से प्रेम लाजवाब है। यहां के खेतों में पशु नहीं दिखते। उनके बिना ही स्त्रियां काम करती हैं। इतना ही नहीं, यहां की फिश फार्र्मिंग का अपना अनूठा अंदाज़ है। धान की खेती के संग-संग मछली पालन करते हैं। बांस इनकी जीवनशैली एवं संस्कृति का अहम हिस्सा है, तो सूरज और चांद की यहां उपासना की जाती है। अपातिनी जनजाति के लोग ज़्यादातर बीमारियों का इलाज़ जड़ी-बूटियों से ही कर लेते हैं। 21वीं सदी में जब मेडिकल साइंस कहां से कहां पहुंच गया है, उस दौर में इस जनजातीय समुदाय की विशिष्ट संस्कृति, त्योहार, लोक नृत्य, रीति-रिवाज एवं परंपराएं हैरान कर देती हैं। हमारे रिज़ॉर्ट से बहुत दूर नहीं थे, अपातिनी के गांव। इसलिए सीमित समय में जो थोड़े क्षण उनके संग बिताने को मिले, उससे यही अनुभव हुआ कि वे काफी अच्छे मेहमाननवाज़ होते हैं, सादगी से जीवन व्यतीत करते हैं और संतुष्ट रहते हैं।
प्रकृति के बीच रोमांचक पड़ाव
इन दिनों जब देश के कई हिस्सों में पारा कहर बरपा रहा है। जीरो घाटी का सुहाना मौसम शीतलता का एहसास कराता है। बताते हैं कि अमूमन वर्ष भर यहां ऐसा ही मौसम रहता है। हां, मार्च से अक्टूबर तक के महीने सबसे मुफीद माने जाते हैं। जैसी कहानी सुनी थी, वैसा ही नज़ारा देखने को मिला हमें जीरो घाटी में। यहां का नीला आकाश, हरियाली और फिर ढलती शाम के रंग चमत्कृत कर देते हैं। 'टैली वाइल्ड लाइफ सैंक्चुअरी अगर अपनी जैव-विविधता, चीतों से परिचित कराती है, तो प्राचीनतम इतिहास को समेटे मेघना गुफा मंदिर में समय बिताने का अपना रोमांच है। 300 फुट की ऊंचाई पर स्थित यह प्राचीन गुफा मंदिर 5000 वर्ष पूर्व की बतायी जाती है, जिसकी खोज़ वर्ष 1962 में हुई थी। इसी प्रकार, 'जीरो पुतो वह पहाड़ी है, जहां आज़ादी के बाद पहला प्रशासनिक केंद्र स्थापित किया गया था। इस पहाड़ी से अपातिनी पठार का शानदार दृश्य देखा जा सकता है। जो लोग ट्रैकिंग व हाइकिंग करना चाहते हैं, वे 'डोलो मंडो की पहाड़ी पर जा सकते हैं। वहीं, कैंपिंग के शौकीन, पंगे रिवर बेसिन के समीप कैंप लगाकर प्रकृति के बीच सुकून भरा समय गुज़ार सकते हैं। इन सबके अलावा, सिद्धेश्वर नाथ शिवलिंग, तरिन फिश फार्म एवं पाइन ग्रोव भी दर्शनीय स्थल हैं।
फेस्टिवल ने बढ़ाई शान
जीरो वैली ने पर्यटन मानचित्र पर अपनी एक खास पहचान बनाई है। इसे और पुख्ता किया है यहां आयोजित होने वाले म्यूजि़क फेस्टिवल ने। सितंबर में होने वाले इस फेस्टिवल में दुनिया के कोने-कोने से संगीत प्रेमी यहां पहुंचते हैं। देश व विदेश के शीर्ष म्यूजिकल बैंड्स के अलावा विश्वभर से आने वाले लोक कलाकार अपनी प्रस्तुति से सबको मंत्रमुग्ध कर देते हैं। इन दिनों यहां का पूरा माहौल संगीतमय हो जाता है। संगीत के साथ आपको स्थानीय व्यंजनों का भरपूर आनंद लेने का मौका मिलता है।
कैसे पहुंचे...
हवाई, रेल या सड़क मार्ग से यहां पहुंच सकते हैं। असम का जोरहाट निकटतम हवाई अड्डा है, जहां से कई घरेलू उड़ानें हैं। वहां से बस या ट्रेन से जीरो घाटी पहुंच सकते है। जो ट्रेन से यात्रा के इच्छुक हैं, वे असम के उत्तर लखीमपुर रेलवे स्टेशन तक पहुंच सकते हैं, जहां से टैक्सी और बसें चार-पांच घंटे में जीरो वैली पहुंचा देती हैं। यात्रा पर जाने से पहले ध्यान रखने योग्य सबसे महïत्वपूर्ण बात यह है कि प्रतिबंधित क्षेत्र होने के कारण अरुणाचल प्रदेश जाने के लिए घरेलू पर्यटकों को 'इनर लाइन परमिट लेना ज़रूरी है, जबकि विदेशी सैलानियों को 'प्रोटेक्टेड एरिया पास लेना होता है। यह सब रेजिडेंट कमिश्नर के कार्यालय से प्राप्त किया जा सकता है, जो दिल्ली, कोलकाता, गुवाहाटी में स्थित हैं।
