बॉलीवुड की प्रतिभाशाली अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने अपनी शानदार एक्टिंग और अलग तरह के किरदारों के दम पर इंडस्ट्री में खास पहचान बनाई है। हालांकि, सफलता की इस मंजिल तक पहुंचने का उनका सफर आसान नहीं था। मुंबई आने के बाद उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ा, यहां तक कि शुरुआती 20 दिनों तक उनके सिर पर अपनी छत भी नहीं थी। स्वरा ने अपने संघर्ष के दिनों, थिएटर से फिल्मों तक के सफर, पिता से मिली सीख और इंडस्ट्री में अपनी पहचान बनाने की कहानी शेयर की। आइए उनकी जिंदगी से जुड़ी कुछ दिलचस्प बातें जानते हैं।

फिल्मों में कैसे आना हुआ?

मैं शुरुआत से ही बॉलीवुड से बहुत प्रभावित थी। एंटरटेनमेंट के नाम पर बस मेरे पास केवल 'चित्रहार और 'सुपरहिट मुकाबला यही दोनों टीवी शोज का सहारा था। जैसे-जैसे बड़ी होती गई, मेरी पसंद बदलती गई। पहले मैं टीचर बनने का सोचती, फिर वेटरनरी डॉक्टर बनने की इच्छा हुई। लेकिन जेएनयू में पढ़ते समय से मैंने इफ्टा के साथ थिएटर करना शुरू किया। वहां के गुरू कहे जाने वाले पंडित एन. के. शर्मा 'ऐक्ट वन नामक संस्था चलाते हैं। मैंने उनके साथ एक नाटक किया। तब मुझे लगा कि एक्टिंग के फील्ड में जाना चाहिए।

पिता की कौन-सी बात जीवन में उतारती हैं?

मेरे पिता सेल्फ्मेड इंसान हैं। मैं उनकी सोच को अपने जीवन में उतारना पसंद करती हूं। मैं पिता के बहुत क्लोज हूं। मुंबई आते समय उन्होंने कहा था कि तुम दूसरे शहर जा रही हो। वहां क्या होगा, मुझे पता नहीं? तुम्हें अपने खुद के लिए हर निर्णय लेना होगा। इस तरह उन्होंने आजादी के साथ-साथ जिम्मेदारी की सीख भी बड़ी ही खूबसूरती से दे दी।

कितना संघर्ष रहा?

आप अगर फिल्म इंडस्ट्री से नहीं हैं और कोई आपका जानकार यहां नहीं है, तो आप को संघर्ष करना ही पड़ता है। फिर भी मुझे काम जल्दी मिल गया और मिल भी रहा है, क्योंकि मैंने हर चुनौतियों का सामना डटकर किया और कर भी रही हूं।

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आप अधिकतर लीक से हटकर फिल्में करती हैं, इसकी वजह?

खुद से अलग चरित्र निभाने में ही चुनौती होती है। इससे आप सीखते हैं और परफॉर्म करने का अवसर मिलता है। मैं हर तरह की फिल्म पसंद करती हूं लेकिन वह कहानी मेरे लिए अधिक मायने रखती है, जो मेरी जिंदगी से काफी दूर हो। 'अनारकली ऑफ आरा करते वक्त मुझे आरा जाना पड़ा। मैं वहां उन महिलाओं से मिली, जो ऐसी परफॉर्मेंस करती हैं। फिल्म 'निल बट्टे सन्नाटा के समय मैं आगरा गई थी। वहां मेड के साथ उनके काम पर जाती थी। उनके घर जाकर, उनके साथ खाना भी खाती थी, ये चीज़ें मुझे करनी अच्छी भी लगी।

महिलाओं का शोषण आज भी होता है। इसके लिए आप किसे जिम्मेदार मानती हैं?

पुरुषों को लगता है कि महिलाओं के साथ कुछ भी करना उन का हक है। यह वैसा ही है जैसा कि किसी ज़माने में जमींदार किसानों के साथ करते थे, ब्राह्मण नीची जातियों के साथ करते थे। यह एक मानसिकता है, जिस में एक सिरफिरा आशिक अपनी प्रेमिका को मार देता है या उस पर तेजाब फेंकता है। नाराज पति अपनी पत्नी पर हाथ उठाता है या एक आशिक रेप करता है। यह वही पिता, भाई, पति या आशिक हैं, जो महिलाओं को इंसानियत और समानता नहीं दे पा रहा है। लोग जब तक ऐसी संकीर्ण मानसिकता से बाहर नहीं निकलेंगे, ऐसी घटनाएं होती रहेंगी। इसके लिए मैं पहला जिम्मेदार दुनिया के सभी धर्मों को मानती हूं। हालांकि, मैं एक धर्मनिरपेक्ष लड़की हूं, लेकिन यह आप को मानना पड़ेगा कि धर्म कहीं न कहीं नारी विरोधी है। इसके बाद संस्कृति, समाज, परिवार और परंपराएं ऐसी मानसिकता को जन्म देती हैं।

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जब आप मुंबई आईं

मैं और मेरी एक सहेली, जिसे एक कंपनी में वकील की जॉब मिली थी, हम दोनों ही मुंबई आ गए। तकरीबन 20 दिनों के बाद मुझे रहने की जगह मिली। मुझे शुरुआती दौर में असिस्टेंट डायरेक्टर रवींद्र रंधावा और राइटर अंजुम राजावली का बहुत सहयोग मिला। मुंबई आने के बाद मैंने कई जगहों पर अपना पोर्टफोलियो भेजना शुरू किया। जितना भी अच्छा काम मिला, हर एक के लिए मुझे ऑडिशन प्रक्रिया से गुजरना पड़ा। शुरुआत हल्‍की थी, पर मैं कभी निराश नहीं हुई। मेहनत और हिम्मत के साथ अपने प्रयास में जुटी रही।

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