सुबह ऑफिस या कॉलेज जाना हो, शादी में तैयार होना हो या फिर सिर्फ आंखों को थोड़ा आकर्षक दिखाना हो, ज्यादातर लोगों का मेकअप काजल के बिना अधूरा लगता है। खासकर भारत में काजल सिर्फ एक ब्यूटी प्रोडक्ट नहीं बल्कि हमारी परंपरा और संस्कृति का भी हिस्सा है। कई घरों में आज भी छोटे बच्चों को बुरी नजर से बचाने के लिए काजल का टीका लगाया जाता है।

दिलचस्प बात तो यह है कि जिस काजल को हम एक ही नाम से जानते हैं, उसे भारत के अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग नामों से पुकारा जाता है। कहीं इसे सूरमा, तो कहीं कान माई तो कुछ जगहों पर काडिगे या कटुका कहा जाता है। इतना ही नहीं, काजल का इतिहास भी हजारों साल पुराना है। आइए जानते हैं कि काजल की शुरुआत कहां से हुई, भारत में इसे किन-किन नामों से जाना जाता है और समय के साथ इसका रूप कैसे बदलता गया?

काजल का इतिहास क्या है?

बहुत से लोगों को लगता है कि काजल की शुरुआत भारत में हुई होगी, लेकिन ऐसा नहीं है। बताया जाता है कि करीब 3100 ईसा पूर्व प्राचीन मिस्र में सबसे पहले काजल का इस्तेमाल किया गया था। उस समय पुरुष और महिलाएं दोनों अपनी आंखों में काले रंग का लेप लगाया करते थे। उस दौर में इसे सिर्फ सुंदर दिखने के लिए ही नहीं लगाया जाता था।

पहले आंखों में लगाया जाता था लेप

लोगों का मानना था कि आंखों में इस लेप को लगाने से आंखों को कुछ हद तक बचाव मिलता है। साथ ही वे इसे आंखों की देखभाल और बुरी नजर से बचने का भी एक तरीका मानते थे। उस समय यह गैलेना (लेड सल्फाइड) और दूसरे मिनरल्स से तैयार किया जाता था।

'काजल' नाम आखिर कहां से आया?

एक और दिलचस्प बात यह है कि 'काजल' शब्द की जड़ अरबी भाषा से जुड़ी हुई है। आपको शायद यह मालूम नहीं होगी लेकिन काजल शब्द कुहल (Kuhl) या कोहल (Kohl) से निकला हुआ माना जाता है। धीरे-धीरे यही शब्द अलग-अलग देशों में पहुंचा और भारत में आकर काजल के नाम से फेमस हो गया।

भारत में काजल को मिले कई नाम

भारत की सबसे बड़ी खूबसूरती उसकी विविधता ही है। यहां एक ही चीज के कई नाम मिल जाते हैं। काजल के साथ भी बिल्कुल ऐसा ही है। जैसे-

  • पंजाबी और उर्दू में इसे सूरमा कहा जाता है।
  • तमिल में काजल का नाम कान माई रखा गया।
  • मलयालम में इसे कन्माशी कहा जाता है।
  • कन्नड़ में लोग इसे काडिगे कहते हैं।
  • तेलुगु में काजल को कटुका कहा जाता है।

आज भारत में अलग-अलग जगहों पर काजल का नाम भले ही बदल जाएं, लेकिन इसका इस्तेमाल लगभग हर जगह आंखों की खूबसूरती बढ़ाने के लिए ही किया जाता है।

भारत में सिर्फ मेकअप नहीं, परंपरा भी है काजल

आपको बता दें कि भारत में काजल का रिश्ता सिर्फ सुंदरता से ही नहीं है। कई परिवारों में आज भी छोटे बच्चों के माथे या कान के पीछे काजल का छोटा सा टीका लगाया जाता है। यह एक धार्मिक और सांस्कृतिक मान्यता है, जिसे लोग बुरी नजर से बचाने के लिए अपनाते हैं।

कलाकार भी लगाते हैं काजल

इसके अलावा भरतनाट्यम, कथकली और कई दूसरे भारतीय शास्त्रीय नृत्यों में भी कलाकार काजल लगाते हैं, ताकि मंच पर उनकी आंखों के एक्सप्रेशन बैठे दर्शकों तक साफ दिखाई दें।

पहले घर में कैसे बनाया जाता था काजल?

आज बाजार में हर तरह का काजल आसानी से मिल जाता है, लेकिन पहले ज्यादातर घरों में काजल लोग खुद से बनाते थे। इसके लिए मलमल के कपड़े या सूती कपड़े की बाती बनाकर उसे अरंडी (कैस्टर) के तेल या शुद्ध घी के दीए में जलाया जाता था। दीए के ऊपर पीतल या तांबे की प्लेट रख दी जाती थी। रातभर में प्लेट पर जो काली लेयर जम जाती थी, उसे इकट्ठा करके उसमें थोड़ा घी या बादाम का तेल मिलाया जाता था। इसी से काजल तैयार होता था। कई जगहों पर बादाम जलाकर भी काजल बनाने की परंपरा रही है।

आज का काजल पहले से कितना अलग है?

समय के साथ काजल भी बदल गया है। पहले जहां यह सिर्फ डिब्बी में मिलता था, वहीं अब बाजार में कई तरह के काजल मिल जाते हैं। जैसे-

  • काजल पेंसिल
  • ट्विस्ट-अप काजल
  • जेल काजल
  • लिक्विड काजल
  • पाउडर काजल

पहले जहां काजल सिर्फ ब्लैक ही होता था, वहीं अब आपको हर कलर जैसे नीला, भूरा, हरा और सफेद रंग का काजल भी आसानी से मिल जाता है।

अब तो आप जान ही गई होंगी कि काजल का सफर हजारों साल पुराना है। इसकी शुरुआत भले ही मिस्र से हुई हो, लेकिन भारत ने इसे अपनी संस्कृति का अहम हिस्सा बना दिया। सबसे खास बात यह है कि हमारे देश में हर भाषा और हर राज्य ने काजल को अपना अलग नाम दिया।

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