क्या उम्र कम होने से इज्जत और ज्ञान भी कम हो जाता है?

लोग कहते हैं कि उम्र के साथ-साथ आपका दिमाग तेज़ हो जाता है और आपको जिंदगी के कई एक्सपीरियंस मिल जाते हैं। ये सही भी है क्योंकि उम्र बढ़ने के साथ कई तजुर्बे हो जाते हैं और दुनिया की थोड़ी सी परख हो जाती है, लेकिन क्या इसका मतलब ये है कि उम्र कम होने का मतलब है कि आपके अंदर बिल्कुल ही ज्ञान नहीं है?
ऐसा कई बार होता है कि उम्र में आपसे बड़े लोग ये जताने की कोशिश करते हैं कि आपके अंदर ना ही ज्ञान है और ना ही आप उनके हिसाब से पूरी तरह से संस्कारी और सुसज्जित हैं। ऐसा मेरे साथ भी हुआ है। अपने पूरे खानदान में मैं सबसे कम उम्र की प्रोफेसर हूं। वैसे मेरे खानदान में बहुत पढ़े-लिखे और ऊंची पोस्ट पर काम करने वाले लोग हैं, लेकिन उन सभी के लिए मैं तो छोटी हूं और मुझमें ज्ञान की कमी है।
जब पहली बार मैंने कॉलेज के तुरंत बाद ही यूजीसी नेट की परीक्षा पास कर ली थी तब लगा था कि जैसे सातवें आसमान पर हूं, लेकिन लोगों को आश्चर्य हुआ था कि भला बिना कोचिंग और ट्यूशन के ऐसा कैसे कर लिया। इसके बाद मैंने टीचिंग में ट्राई तो किया, लेकिन बहुत कम उम्र होने के कारण लोगों को लगता था कि मैं पढ़ा नहीं पाऊंगी।

इसके बाद मैंने एक कंपनी में जॉब जॉइन कर ली और 5 साल वहीं बिताए, लेकिन मुझे तो टीचिंग में ही जाना था और उसके लिए प्रयास करती रही। दो-तीन बार नेट का पेपर दिया और हर बार क्वालीफाई भी कर लिया वो भी जॉब के साथ, लेकिन लोगों के ताने कम नहीं हुए कि भला इतनी दुबली-पतली लड़की, इतनी कम उम्र तो ये कैसे पढ़ा पाएगी?
मुझे तो ये भी सुनने को मिला कि मैं लोगों का भविष्य बर्बाद कर दूंगी। मेरे कुछ सवाल हैं ऐसे लोगों से जो समझते हैं कि मैं पढ़ा नहीं सकती-
- क्या ज्ञान का मतलब तभी होता है जब बाल पक जाएं?
- दुबली-पतली हो पढ़ा नहीं सकती हो का क्या मतलब है? क्या बॉडी शेमिंग करने के बाद ही पढ़ाया जा सकता है?
- क्या कम उम्र में कोई बड़ी उपलब्धि हासिल करना गलत है जो इस तरह ताने दिए जाते हैं?
- क्या शरीर और लुक्स का ज्ञान पर भी कोई असर पड़ता है?
- 'अरे पढ़ाकर क्यों बच्चों का भविष्य खराब कर रही हो' जैसी बातें क्या वाकई किसी के कॉन्फिडेंस पर असर नहीं डालतीं?
ऐसी बातों से कॉन्फिडेंस खत्म करना बंद करें
ऐसी बातें जो लोग करते हैं वो एक तरह से तो कॉन्फिडेंस खत्म करने की कोशिश करते हैं। हमारे समाज में लोगों को ये नहीं पता होता कि कंस्ट्रक्टिव क्रिटिसिजम और तानों में क्या अंतर है। लोगों को लगता है कि वो सिर्फ मजाक कर रहे हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। इस तरह की बातों से कॉन्फिडेंस भी खत्म होता है। पहली बार क्लास में जाते और पढ़ाते समय मुझे भी यही लगा था कि मेरे साथ ना जाने क्या हो जाएगा, डर के कारण पैर भी कांपने लगे थे और दूसरों की बातें दिमाग में घूमने लगी थीं।

मैं डिग्री कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हूं और मेरी क्लास के कुछ बच्चे उम्र में मुझसे भी बड़े हैं। कई बार तो ऐसा भी हुआ है कि वॉचमैन ने मुझे ही स्टूडेंट समझ लिया हो। मैं आपको बता दूं कि इससे मुझे बुरा जरूर लगता है, लेकिन मेरा आत्मविश्वास कम नहीं होता।
मैं हर उस लड़की को कहना चाहूंगी जिसे इस तरह की बातों से पीछे हटाया जाता है। ये 'अरे हम तो मज़ाक कर रहे थे' वाला एटिट्यूड अगर आप सह पा रही हैं तो ठीक और अगर नहीं सही पा रही हैं तो खुलकर बोलें। आपका आत्मविश्वास बनाए रखना आपकी ड्यूटी है और दुनिया तो कोशिश करेगी ही इसे तोड़ने की।
सृष्टि दीक्षित
(सृष्टि के पास मीडिया में 5 साल काम करने का एक्सपीरियंस है और वो अब इंदौर के प्रेस्टीज मैनेजमेंट कॉलेज में बतौर असिस्टेंट प्रोफेसर काम कर रही हैं। वो इस टीचिंग जॉब का अपना एक्सपीरियंस अपने शब्दों में बयां कर रही हैं।)
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