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हिंदू धर्म में क्यों होती है तुलसी के पौधे की पूजा

सनातन धर्म में जिन पौधों की पूजा का विधान है उनमें से तुलसी सबसे प्रमुख मानी जाती है। आइए जानें आखिर क्यों इस पौधे की पूजा विधि-विधान और श्रद्धा से की जाती है और इसका महत्व क्या है। 
Updated:- 2023-03-14, 17:33 IST
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हिंदू धर्म में विभिन्न देवी-देवताओं की पूजा के साथ कई पेड़-पौधों की भी पूजा की जाती है। दरअसल भारतीय संस्कृति में ऐसी कई परंपराएं हैं जो सदियों से चली आ रही हैं। ऐसी ही परम्पराओं में से एक है पवित्र पौधों की विधि-विधान के साथ पूजा करना।

जब पौधों की पूजा की बात करते हैं तब सबसे ज्यादा प्रमुख है तुलसी की पूजा। तुलसी को सबसे ज्यादा पवित्र माना जाता है और कई ऐसी पूजन हैं जो इसकी पत्तियों के बिना अधूरे माने जाते हैं।

हम सभी तुलसी का पूजन श्रद्धा से करते हैं लेकिन शायद इस बारे में बहुत कम लोगों को जानकारी होगी कि इस पौधे का पूजन क्यों किया जाता है और इसके लाभ क्या हैं। आइए आइए ज्योतिर्विद पंडित रमेश भोजराज द्विवेदी जी से जानें इससे जुड़ी कुछ बातों के बारे में। 

हिंदू धर्म में क्यों होती है तुलसी की पूजा 

tulsi plant puja in hindu religion

पुराणों में तुलसी को पवित्र पौधा बताया गया है और इसकी पूजा हम भगवान विष्णु से जुड़े होने की वजह से करते हैं जिसकी पूजा हम भगवान विष्णु से जुड़े होने की वजह से करते हैं। मान्यता है कि जब हम भगवान विष्णु को कुछ भी भोग अर्पित करते हैं तब तुलसी की पत्तियां जरूर उस भोग में शामिल करनी चाहिए अन्यथा उन्हें भोग स्वीकार्य नहीं होता है। संस्कृत में तुलसी शब्द का अर्थ है 'अतुलनीय'। इसके कई औषधीय उपयोग और स्वास्थ्य लाभ भी हैं। तुलसी की हिंदू धर्म में पूजा की कहानी बड़ी ही रोचक है। 

तुलसी की कहानी के अनुसार एक समय की बात है, जालंधर  नाम का एक असुर था, जो बहुत शक्तिशाली था। उसे अपनी शक्तियों के अलावा अपनी पत्नी वृंदा का भी संरक्षण प्राप्त था, जो बहुत ही गुणी थी।

वह भगवान विष्णु की बहुत बड़ी भक्त भी थीं। एक बार देवताओं और असुरों के बीच युद्ध हुआ, लेकिन देवता इसे जीतने में असमर्थ थे क्योंकि वृंदा की आध्यात्मिक शक्तियां जालंधर की रक्षा कर रही थीं। उसे मारने के लिए उसकी पवित्रता भंग करना आवश्यक था। इसलिए, भगवान विष्णु जालंधर के रूप में वृंदा के पास पहुंचे, अपने पति के रूप में भगवान विष्णु को वृंदा नहीं पहचान पाईं और देवतागण जालंधर को मारने में समर्थ हो गए।  

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भगवान विष्णु के वरदान से बनीं तुलसी पूजनीय  

tulsi pujan in astrology

जालंधर के वध के बाद भगवान विष्णु अपने वास्तविक रूप में आए और वृंदा को एहसास हुआ कि उनके पति के रूप में स्वयं भगवान विष्णु थे। उसे यह भी पता चला कि उसका पति जालंधर अब जीवित नहीं रहा।

इससे वह क्रोधित हो गईं और उन्होंने भगवान विष्णु को श्राप दिया कि वह पत्थर के बन जाएंगे। उसने उसके श्राप को पूरे दिल से स्वीकार किया और उसे अपने पति के पिछले जीवन की वास्तविक कहानी बताई और बताया कि उसे उसे क्यों मारना पड़ा। बाद में वृंदा ने अपने इष्टदेव को श्राप देने के लिए पश्चाताप किया और उनसे क्षमा मांगी। लेकिन चूंकि वह अपने पति के बिना नहीं रह सकती थीं, इसलिए वृंदा ने अपना शरीर त्यागने का निर्णय लिया। 

वृंदा की भक्ति से प्रसन्न होकर, भगवान विष्णु ने उसे वरदान दिया कि उसकी राख से तुलसी का पौधापैदा होगा और पौधे का विवाह शालिग्राम से होगा, जो स्वयं भगवान विष्णु हैं। उसने उससे यह भी कहा कि वह तुलसी के पत्तों के बिना कोई भी प्रसाद स्वीकार नहीं करेंगे।  इसलिए हिंदू धर्म में तुलसी के पौधे की पूजा होती है और कार्तिक महीने में तुलसी के पौधे का शालिग्राम के साथ विवाह होता है। 

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माता लक्ष्मी का है तुलसी से जुड़ाव 

tulsi plant in mythology

मान्यता है कि माता लक्ष्मी भी तुलसी के पौधे से जुड़ी हुई हैं और ऐसा कहा जाता है कि जो लोग समृद्ध और शांतिपूर्ण जीवन चाहते हैं उनके लिए यह पौधा घर में नितांत आवश्यक है। जिस घर में तुलसी का पौधा लगा होता है वहां सदैव लक्ष्मी का वास रहता है और धन का आगमन होता है। 

शास्त्रों से है तुलसी के पौधे का संबंध 

प्राचीन शास्त्रों में, तुलसी को स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का प्रवेश द्वार माना जाता है। शास्त्रों में बताया गया है कि तुलसी की निचली शाखाओं में और इसके तने में अन्य सभी देवी-देवताओं और सभी हिंदू तीर्थों का वास होता है। तुलसी के पौधे के हर एक हिस्से को पूजनीय बताया गया है और इसलिए शास्त्रों में इसकी पूजा का विधान बताया गया है। तुलसी हिंदू धर्म में सबसे पवित्र पौधा है। 

पौराणिक कथाओं और शास्त्रों में लिखी मान्यताओं की वजह से ही तुलसी को हिन्दू धर्म में सबसे पवित्र पौधे के रूप में पूजा जाने लगा और इसकी पवित्रता से सभी नकारात्मक शक्तियां दूर रहती हैं। 

 

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