रिश्ता टूटा, अधिकार नहीं; तलाक के बाद भी महिलाओं को मिलते हैं ये कानूनी हक

तलाक के बाद महिलाओं को गुजारा भत्ता, स्त्रीधन, बच्चों की कस्टडी और घर में रहने जैसे कई कानूनी अधिकार मिलते हैं। भारतीय कानून यह सुनिश्चित करता है कि रिश्ता टूटने के बावजूद महिला का स्वाभिमान और आर्थिक सुरक्षा बनी रहे।
Updated:- 2026-10-19, 13:52 IST
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शादी का रिश्ता खत्म होना किसी महिला की जिंदगी का अंत नहीं, बल्कि कई बार एक नई शुरुआत होती है। तलाक के बाद अक्सर महिलाओं के मन में सबसे बड़ा सवाल होता है कि अब उनके खर्च, रहने की जगह, बच्चों की जिम्मेदारी और शादी के दौरान बनाई गई आर्थिक स्थिति का क्या होगा? क्या पति से अलग होने के बाद उन्हें आर्थिक मदद मिल सकती है? क्या वे अपने गहनों और कमाई पर अधिकार रखती हैं?

भारतीय कानून महिलाओं को ऐसे कई अधिकार देता है, जो तलाक के बाद भी उनकी सुरक्षा और सम्मान बनाए रखने में मदद करते हैं। कानून की जानकारी हर महिला की सबसे बड़ी ताकत है। इस मकसद के साथ हमने 'निडर नारी' सीरीज शुरू की है, जिसके अंतर्गत आज हम तलाक के बाद महिलाओं के क्या-क्या अधिकार हैं? इसके बारे में बताने जा रहे हैं। नीचे लेख में अंकित देव अर्पण, साइबर लॉयर डायरेक्टर Lex Cyber Attorneys से जानें।

तलाक के बाद महिलाओं को मिलते हैं ये कानूनी अधिकार (Legal Rights For Women After Divoce)

आज के समय में भी बहुत सारी महिलाएं ऐसी हैं, जिन्हें ये नहीं पता है कि तलाक के दौरान या पहले ही नहीं बल्कि तलाक के बाद भी उनके पास कानूनी अधिकार हैं। नीचे लेख में अधिवक्ता अंकित देव अपर्ण से जानें-

गुजारा भत्ता पाने का अधिकार

'रजनीश बनाम नेहा' (2020) केस में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भरण-पोषण कोई दान नहीं, बल्कि महिला का कानूनी हक है। वहीं, 'मोहम्मद अब्दुल समद बनाम तेलंगाना राज्य' (2024) के केस में सर्वोच्च न्यायालय ने दोहराया कि धर्मनिरपेक्ष कानून के तहत हर तलाकशुदा महिला भरण-पोषण की हकदार है।

divorce rights for women in india

भरण पोषण जिसे कानूनी भाषा में मेंटेनेंस और एलिमनी (Maintainance & Alimony) कहा जाता है उसके परिपेक्ष्य में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 144 (CrPC धारा 125) और हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 25 के तहत महिला को अपने वैवाहिक जीवनस्तर के अनुरूप स्थायी गुजारा भत्ता पाने का पूर्ण अधिकार है।

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स्त्रीधन और अपने गहनों पर अधिकार

अधिकारों की यह सीमा बस भरण पोषण तक ही सीमित नहीं है, अपितु जब चर्चा स्त्रीधन की आती है तो वहां भी यह कहा गया है कि "विवाह में मिले गहने व उपहार ('स्त्रीधन') पर केवल महिला का मालिकाना हक होता है।" अगर केस के माध्यम से समझें तो 'प्रतिभा रानी बनाम सूरज कुमार' के मामले के निर्णयानुसार, स्त्रीधन नहीं लौटाने पर पति या ससुराल पक्ष के विरुद्ध भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 316(2) (पूर्व में IPC धारा 406) के तहत दंडात्मक कार्रवाई हो सकती है। अतः महिलाओं का अपने स्त्रीधन पर मालिकाना हक होता है।

बच्चों की कस्टडी, देखभाल और साझा घर में रहने से संबंधित कानूनी सुरक्षा

महिलाओं के हितों की रक्षा के लिए घरेलू हिंसा अधिनियम (Domestic Violence Act) 2005 की धारा 17 एवं 19 ना केवल महिलाओं के लिए तात्कालिक/वैकल्पिक आवास की चर्चा करता है, अपितु किराया भत्ता देने की भी पैरोकारी करता है। वहीं Hindu Minority and Guardianship Act के की धारा 6 के अनुसार नाबालिग बच्चों की कस्टडी एवं उनके भरण पोषण का अभी अधिकार महिलाओं के पास सुरक्षित है।

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भारतीय कानून एवं समय समय पर उसमें होने वाले सकारात्मक बदलावों ने महिलाओं के अधिकारों को और वृहद रूप में स्थापित किया है, ऐसा माना जा सकता है कि तलाक केवल वैवाहिक अनुबंध को समाप्त करता है, नारी के स्वाभिमान, स्त्रीधन और सम्मानजनक जीवन जीने के कानूनी हक को नहीं।

क्या नौकरी करने वाली महिला भी गुजारा भत्ता मांग सकती है?

हां, नौकरी करने वाली महिला भी कानूनन गुजारा भत्ता की मांग कर सकती है, बशर्ते उसकी आय उसके और उसके बच्चों के जीवन-निर्वाह के लिए पर्याप्त न हो।  इसका मानक है कि वह तलाक के बाद किस स्टैंडर्ड ऑफ लिविंग में है, अगर यह उसके ससुराल की तुलना में कम है तो निश्चित रूप से वह गुजारा भत्ता पाने की हकदार है।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 की धारा 144 (पूर्व में CrPC धारा 125) और हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 24 व 25 के तहत कोर्ट पति और पत्नी दोनों की आय, संपत्ति और देनदारियों की तुलना करता है। यदि पत्नी की सैलरी पति की तुलना में काफी कम है और वह अपने वैवाहिक जीवनस्तर को बनाए रखने के लिए अपर्याप्त है, तो कोर्ट अंतर की भरपाई के लिए पति को भरण-पोषण देने का आदेश दे सकता है।

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अगर पत्नी शिक्षित है और अधिक आय सृजित कर रही है, जो उसके बेहतर जीवन यापन हेतु पर्याप्त है, तो ऐसी परिस्थिति में कोर्ट उसे गुजारा भत्ता देने से इनकार कर सकता है, हालांकि नाबालिग बच्चों के भरण पोषण का अधिकार अभी भी स्त्री के पास रहता है, जो पति के द्वारा दे है।

केस के माध्यम से समझें तो पुनः रजनीश बनाम नेहा 2020 के मामले को देखें जहां न्यायालय का मानना था कि केवल पत्नी का कमाना ही एक आधार नहीं हो सकता है कि उसके भरण पोषण की राशि नहीं दी जाए, उसकी आय का तुलनात्मक विश्लेषण जरूरी है और अगर वह आय अपेक्षानुसार कम है तो पत्नी को गुजारा भत्ता मिलने से नहीं रोका जा सकता है।

वहीं सुनीता कछवाहा बनाम अनिल कछवाहा के मामले में कोर्ट का रुख था कि पत्नी का शिक्षित होना भरण पोषण के दावे को खारिज करने का आधार नहीं है। शिक्षित एवं कमा रहीं महिलाएं भी इसकी पात्र हैं।

क्या तलाक के बाद पत्नी को पति की संपत्ति में आधा हिस्सा मिलता है?

नहीं, भारतीय कानून में तलाक के बाद पति की संपत्ति में पत्नी को 50% हिस्सा मिलने का कोई प्रावधान नहीं है। हालांकि फिल्मों एवं बातचीत में इसका उल्लेख मिलता है लेकिन वास्तविकता अलग है।

अगर संपत्ति केवल पति के नाम पर है और उसने अपने पैसों से खरीदी है, तो तलाक के बाद पत्नी उस पर मालिकाना हक नहीं मांग सकती। हालांकि, हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 25 के तहत स्थायी गुजारा भत्ता (Permanent Alimony/One-time Settlement) की राशि तय करते समय कोर्ट पति की कुल संपत्ति और आर्थिक हैसियत को आधार जरूर बनाता है। जिससे कोर्ट को भत्ता निर्धारण में सुलभता हो।

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पति के जीते-जी या तलाक के बाद उसकी पैतृक संपत्ति (Ancestral Property) में पत्नी का कोई हिस्सा नहीं होता। लेकिन हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम, 1956 के तहत पति-पत्नी के बच्चों का अपने पिता की पैतृक संपत्ति में जन्मसिद्ध अधिकार (Coparcenary Right) पूरी तरह सुरक्षित रहता है।

एक विशेष विषय जॉइंट प्रॉपर्टी अर्थात संयुक्त संपत्ति से संबंधित है, जो यह बताता है कि यदि कोई प्रॉपर्टी पति-पत्नी दोनों के संयुक्त नाम पर खरीदी गई है, या पत्नी ने उसे खरीदने या ईएमआई चुकाने में आर्थिक योगदान दिया है, तो हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 27 और सामान्य संपत्ति कानून के तहत पत्नी अपने योगदान के अनुपात में हिस्से का दावा कर सकती है।

तलाक के बाद अपने कानूनी अधिकारों के लिए कहां संपर्क करें?

तलाक के बाद अपने कानूनी अधिकारों और भत्ते की प्राप्ति के लिए आप नीचे दिए गए जगहों पर जाकर अपने अधिकार से जुड़ी बात कर सकती हैं।

  • पारिवारिक न्यायालय (Family Court)- अपने क्षेत्र के स्थानीय पारिवारिक न्यायालय में वकील के माध्यम से गुजारा भत्ता (धारा 125 CrPC या संबंधित पर्सनल लॉ) के लिए याचिका दायर करें।
  • जिला विधिक सेवा प्राधिकरण (District Legal Services Authority - DLSA)- अगर आपके पास वकीलों की फीस के लिए पैसे नहीं हैं, तो आप डीएलएसए से मुफ्त कानूनी सहायता (Free Legal Aid) प्राप्त कर सकती हैं।
  • राष्ट्रीय या राज्य महिला आयोग (Women's Commission)- पति द्वारा भरण-पोषण से इनकार करने या प्रताड़ित किए जाने पर महिला आयोग में शिकायत दर्ज कराई जा सकती है।
  • एनजीओ और महिला सहायता केंद्र- कानूनी परामर्श और मध्यस्थता के लिए मान्यता प्राप्त महिला संगठनों की मदद ली जा सकती है।

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महिलाओं के सशक्तिकरण और उनके अधिकार से जुड़ी हर अहम बात हम हफ्ते में दो दिन अपनी खास सीरीज निडर नारी के जरिए आपको बताएंगे।

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FAQ
क्या तलाक की कार्यवाही चलने के दौरान भी महिला को अंतरिम गुजारा भत्ता (Interim Maintenance) मिलता है?
हां, केस लंबित रहने के दौरान कोर्ट महिला को केस का खर्च और दैनिक जरूरतों के लिए अंतरिम भरण-पोषण की मंजूरी देता है।
तलाक के बाद बच्चों की कस्टडी (Child Custody) आमतौर पर किसे मिलती है?
छोटे बच्चों की कस्टडी आमतौर पर मां को दी जाती है, जबकि बच्चे की भलाई और सहमति को सर्वोपरि माना जाता है।
क्या पति तलाक के बाद बच्चे के पालन-पोषण का खर्च देने से मना कर सकता है?
नहीं, कस्टडी किसी के भी पास हो, पिता को बच्चे की पढ़ाई, स्वास्थ्य और परवरिश का खर्च उठाना ही पड़ता है।
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