सरगी, बायना और करवा बदलना, करवा चौथ की इन रस्मों के पीछे छिपे हैं खास मायने

करवा चौथ का त्योहार कल यानी 29 अक्टूबर को मनाया जाएगा। इस दिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र की कामना के लिए व्रत रखती हैं। इस दिन कई रस्में भी की जाती हैं। सरगी, बायना और करवा बदलना जैसी रस्मों के पिछे क्या अर्थ छुपा है, चलिए आपको बताते हैं।    
Updated:- 2026-10-28, 09:11 IST
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करवा चौथ का त्योहार किसी भी शादीशुदा महिला के लिए बहुत खास होता है। इस खास दिन पर महिलाएं पति की लंबी उम्र के लिए व्रत रखती हैं और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना भी करती हैं। इस बार करवा चौथ का त्यौहार कल यानी 29 अक्टूबर को मनाया जाएगा। इस खास दिन पर व्रत और पूजा-पाठ के साथ कई रस्में निभाई जाती हैं। सुबह सूर्योदय से पहले सरगी खाने से लेकर शाम को पूजा करने, बायना निकालने और करवा बदलने तक कई ऐसी रस्में निभाई जाती हैं, जो पीढ़ियों से चली आ रही हैं। हर एक रस्म के पीछे एक खास मतलब और भाव छुपा होता है, चलिए आपको इसके बारे में बताते हैं।

सरगी क्या होती है?

करवा चौथ के व्रत की शुरुआत सरगी से की जाती है। सूर्योदय से पहले व्रत रखने वाली महिलाएं सरगी खाती हैं। आमतौर पर सास अपनी बहू को सरगी देती हैं, जिसमें फल, मिठाइयां, सूखे मेवे, फेनी, मठरी और दूसरी खाने-पीने की चीजें शामिल होती हैं। यह सास के स्नेह, आशीर्वाद और बहु के सुखी वैवाहिक जीवन से जुड़ी होती है। साथ ही सरगी खाने का एक अहम कारण यह भी है कि दिनभर बिना कुछ खाए-पिए रहने के दौरान शरीर को कुछ ऊर्जा मिल सके।

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बायना निकालना क्या होता है?

करवा चौथ पर बायना निकालने की परंपरा भी काफी अहम मानी जाती है और लगभग सभी घरों में इसे निभाया जाता है। बायना में आमतौर पर मिठाई, फल, कपड़े, रुपये या अन्य सुहाग से जुड़ी चीजें रखी जाती हैं। कई परिवारों में महिलाएं पूजा के बाद बायना अपनी सास को देती हैं, जबकि कुछ जगहों पर इसे परिवार की अन्य बड़ी महिलाओं को भी दिया जाता है। इस रस्म का असल भाव बड़ों के प्रति सम्मान, आशीर्वाद प्राप्त करना और परिवार के रिश्तों को मजबूत बनाए रखना है।

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करवा फेरना क्या होता है?

करवा चौथ के दिन करवा फेरने की रस्म भी निभाई जाती है। करवा चौथ की पूजा में मिट्टी के करवे का विशेष स्थान होता है। करवा पानी रखने वाला पारंपरिक पात्र है, जिसे पूजा में इस्तेमाल किया जाता है। इस रस्म में महिलाएं एक जगह गोल घेरा बनाकर बैठती हैं, करवा चौथ की कथा सुनाती हैं और फिर करवे को आगे बढ़ाती हैं। इस दौरान कई पारंपरिक गीत भी गाए जाते हैं। यह परिवार की सुख-समृद्धि से जुड़ा होता है।

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