ढोल-नगाड़ों से लेकर बैनर-पोस्टर तक, जानिए पहले के जमाने में कैसे होती थे एडवरटाइजमेंट?

पुराने जमाने में विज्ञापन का तरीका आज के डिजिटल एडवरटाइजमेंट से बिल्कुल अलग था। इसके लिए लोग ऐसे अनोखे तरीके अपनाते थे, जो उस समय के हिसाब से लोगों को काफी आकर्षित करते थे।
Updated:- 2026-08-02, 17:56 IST
how were advertisements done before tv and internet know history

आज के समय में शायद ही कोई ऐसी जगह होगी, जहां आपको विज्ञापन देखने को न मिले। हर दीवार, बिल्डिंग और सड़क के किनारे लगे पोस्टर और बैनर इस तरह से डिजाइन किए जाते हैं कि न चाहते हुए भी यह लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचते हैं। आज के समय में हर चीज को लोगों तक पहुंचाने के लिए विज्ञापन का सहारा लिया जाता है, लेकिन क्या आपने सोचा है कि जब इंटरनेट, टीवी और सोशल मीडिया का जमाना नहीं था, तब लोगों तक किसी चीज की जानकारी कैसे पहुंचती थी। उस समय लोग अपने सामान और सेवाओं का प्रचार कैसे करते थे? आप भी अगर इसके बारे में जानना चाहती हैं, तो यह आर्टिकल आपके काम आएगा। आज के इस आर्टिकल में हम आपको एडवरटाइजमेंट के इतिहास के बारे में विस्तार से जानकारी देंगे।

ढोल-नगाड़ों और मौखिक रूप से होता था प्रचार

विज्ञापन पहले भी किया जाता था, लेकिन पहले इसका तरीका अलग था। उस समय व्यापारी अपने सामान या सेवाओं की जानकारी लोगों तक पहुंचाने के लिए जगह-जगह जाकर ढोल-नगाड़े बजाते थे। उस समय का विज्ञापन और भी ज्यादा खास होता था, क्योंकि तब हर कोई जानकारी को बड़े ध्यान से सुनता था। ऐसा इसलिए, क्योंकि तब मनोरंजन के लिए ज्यादा साधन नहीं होते थे, इसलिए लोगों को इस तरह की चीजें भी आकर्षित करती थी।

कैसे होता था प्रचार?

  • व्यापारी बाजारों और गलियों में आवाज लगाकर अपने सामान का प्रचार करते थे।
  • गांवों और कस्बों में किसी मेले, नाटक या आयोजन की जानकारी देने के लिए ढोल-नगाड़ों का इस्तेमाल किया जाता था।
  • यह तरीका लोगों से सीधे जुड़ने का सबसे आसान माध्यम माना जाता था।

History of advertising

दीवारों पर लिखे विज्ञापनों की शुरुआत

व्यापार बढ़ने के साथ-साथ ही विज्ञापन करने के तरीके में भी बदलाव होने लगा। जब व्यापारियों को लगा कि मौखिक रूप से प्रचार करने पर उन्हें ज्यादा फायदा नहीं हो रहा है, तो अपने सामान की पहचान बनाने बनाने के लिए उन्होंने दीवारों पर विज्ञापन लिखने का चलन शुरू किया।

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कैसे होता प्रचार?

  • पहले दीवारों पर पेपर या पोस्टर नहीं बल्कि लिखकर प्रचार किया जाता था।
  • रंगों से बनाए गए ये विज्ञापन लंबे समय तक लोगों का ध्यान आकर्षित करते थे।
  • छोटे व्यापारियों के लिए यह कम खर्च में प्रचार करने का अच्छा तरीका था।

Traditional advertising methods

प्रिंटिंग प्रेस और पर्चों का दौर

विज्ञापन की दुनिया में बड़ा बदलाव तब आया जब प्रिंटिंग प्रेस की शुरुआत हुई। 15वीं शताब्दी में जोहान्स गुटेनबर्ग (Johannes Gutenberg) द्वारा इसकी शुरुआत की गई थी।

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कैसे होता था प्रचार?

  • इसके आने के बाद पोस्टर, पर्चे और छोटे विज्ञापन छापे जाने लगे।
  • लोगों को इससे जानकारी ज्यादा लोगों तक पहुंचाना और भी आसान हो गया।
  • हाथ से लिखे प्रचार की जगह छपे हुए विज्ञापनों की तरफ लोग ज्यादा आकर्षित होने लगे।

Ancient advertising techniques

कहां से शुरू हुआ विज्ञापन का असली दौर?

विज्ञापन का असली दौर अखबारों के साथ माना जाता है। माना जाता है कि अखबारों में विज्ञापनों की शुरुआत 17वीं शताब्दी सेहोल गई थी। इसके बाद विज्ञापन अखबारों में छपने लगे और एक साथ लाखों लोगो तक इसे पहुंचना आसन हो गया।

  • इसके बाद 20वीं शताब्दी में रेडियो और टीवी आने के बाद विज्ञापन का विस्तार और भी बढ़ गया। टीवी विज्ञापनों ने ब्रांड को लोगों के घरों तक पहुंचाया।
  • टीवी के दौर के बाद शुरू हुआ बैनर और होर्डिंग्स के जरिए लोगों तक पहुंचने का नया दौर। इसके बाद सड़कों, बाजारों और इमारतों पर बड़े विज्ञापन लगाए जाने लगे। फिल्मों, कंपनियों और दुकानों के प्रचार में इनका खूब इस्तेमाल हुआ। दूर से दिखाई देने वाले बड़े -बड़े विज्ञापनों ने लोगों का खूब ध्यान खींचा।

Printing press advertising history

अब विज्ञापन का डिजिटल दौर सबसे ज्यादा बढ़ गया है। सोशल मीडिया के जरिए देश-विदेश तक कुछ ही सेकेंड में पहुंचना आसान हो गया है। कंपनियां सोशल मीडिया, वेबसाइट और मोबाइल ऐप्स के जरिए ग्राहकों तक पहुंच रही हैं।

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Image Credit: MAGNIFIC, GEMINI

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