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Main Hoon Apni Dhanlaxmi Part-22: घर खरीदना या किराए पर रहना, क्या है सही? जानें पूरा गणित

पिछले हफ्ते हमने अचल संपत्ति के बारे में बात की कि क्यों खासकर महिलाओं के लिए उनके नाम पर मकान होना महज वित्तीय निर्णय नहीं होता, बल्कि उसके मायने कहीं अधिक होते हैं। वह उनकी आर्थिक सुरक्षा और गरिमा से जुड़ा मामला होता है। इस हफ्ते हम इस विषय में समझ को विस्तार देने का प्रयास करेंगे।
Updated:- 2026-04-21, 13:31 IST
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आप किन चीजों की इच्छा रखती हैं और क्या आर्थिक रूप से वहन करने की स्थिति में हैं, इसके लिए मानसिक रूप से स्पष्ट होना चाहिए। बिना गुणा गणित लगाए भावुक हो जाना आपकी उम्मीदों से जुड़ा मामला होता है। भावुक हुए बिना सिर्फ धन का हिसाब लगाना अलग बात है। हमें दोनों की आवश्यकता होती है। कल्पना कीजिए कि किसी शहर में फ्लैट की कीमत 60 लाख रुपये है। आपको लगेगा कि अपनी खुशी के लिए इतना खर्च तो वहन किया जा सकता है। अधिकांश लोग हिसाब लगाएंगे तो जेहन में पहले आएगा कि ईएमआई कितनी होगी, जबकि वह फ्लैट की वास्तविक कीमत का सिर्फ एक हिस्सा है। ज्यादातर बैंक 20 प्रतिशत डाउनपेमेंट की अनिवार्यता रखते हैं। इस प्रकार 60 लाख के फ्लैट के लिए 12 लाख तत्काल आपको देने पड़ेंगे।

आपकी जमापूंजी या निवेश से यह राशि निकल जाएगी, उस पर मिलने वाला ब्याज या लाभांश की संभावना समाप्त हो जाएगी। बहुत से परिवार इसके लिए धन जुटाने की खातिर अपनी बचत, फिक्स्ड डिपॉजिट्स और कभी-कभी बच्चों की शिक्षा के लिए रखी गई धनराशि तक निकाल देते हैं। यहां पर आपको रुककर एक बार विचार करना चाहिए कि क्या ये उचित होगा।
इसके बाद रजिस्ट्रेशन और स्टांप ड्यूटी का खर्च आता है। अधिकांश भारतीय शहरों में ये प्रॉपर्टी के मूल्य का पांच से सात प्रतिशत होता है। इस तरह 60 लाख के फ्लैट के लिए आपको तीन-चार लाख रजिस्ट्री के लिए सरकार को देने पड़ेंगे। ये धन पुन: प्राप्त नहीं होगा। बहुत से लोग इस खर्च की अनदेखी कर जाते हैं।

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इसके बाद आता है घर की आंतरिक साजसज्जा का खर्च। पेंट, फ्लोरिंग, किचेन, पंखे, गीजर, पर्दे इत्यादि पर भी धन खर्च होता है। इसमें तीन लाख से आठ लाख रुपये तक खर्च आता है। ये खर्च आपकी पसंद और शहर की महंगाई से प्रभावित होता है। बहुत से परिवार इसके लिए अलग से बजट नहीं रखते। वे तो बस डाउन पेमेंट की व्यवस्था करते हैं और लोन के कागजों पर हस्ताक्षर कर देते हैं। फिर उन्हें एहसास होता है कि फ्लैट को रहने लायक बनाने के लिए चार-पांच लाख खर्च अतिरिक्त खर्च करना पड़ेगा । इस धन की व्यवस्था पर्सनल लोन से होती है या किसी अन्य कार्य के लिए बचाकर रखा गया धन इस मद में खर्च हो जाता है।
अब होम लोन पर आते हैं। बाजार भाव के अनुसार 8.5 प्रतिशत ब्याज दर पर आपने 48 लाख का लोन लिया है। 20 साल के लिए लोन लेने पर आपकी ईएमआई प्रतिमाह करीब 41,800 रुपये आएगी।
करीब 20 साल में आप सिर्फ लोन के 48 लाख अदा नहीं करते, बल्कि करीब एक करोड़ राशि की अदायगी बैंक को करते हैं। ब्याज ही करीब 52 लाख रुपये हो जाता है। यानी दोगुणा धन अदा करते हैं। यहां हम होम लोन के विरोध में बहस नहीं कर रहे। कभी-कभी ये निर्णय बिल्कुल सही रहता है, पर ये घर खरीद की कीमत का वास्तविक आंकड़ा अलग होता है, जिसे प्रत्येक परिवार को पहले देखना समझना चाहिए।

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एक बार गृहप्रवेश के बाद ये कीमत आपके अन्य खर्चों के साथ शांत भाव से साथ चलती है। मेंटीनेंस शुल्क, प्रॉपर्टी टैक्स और मरम्मत की कीमत जो पहले मकान मालिक को अदा करनी पड़ती थी वह अब आपकी देयता है। उसी इलाके में मिलते-जुलते फ्लैट का किराया करीब 20 हजार होगा। करीब 20 साल तक आप जो किराया अदा करेंगे वो ईएमआई में जाने वाली कुल धनराशि से कम होगा, साथ ही आपको मरम्मत का खर्च भी वहन नहीं करना पड़ेगा। ईएमआई की राशि से किराए की राशि घटाकर शेष जो 20-22 हजार बचेंगे उसे एसआईपी के माध्यम से अच्छे विविधतापूर्ण इक्विटी फंड में निवेश कर दें तो करीब दो दशक में एक बड़ी राशि खड़ी हो जाएगी। जो किराएदार खर्च के इस अंतर को समझकर निवेश करते हैं वो भी कालांतर में अच्छी आर्थिक स्थिति में होंगे।

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अब सवाल उठता है कि कौन सा निर्णय बेहतर होगा? इसका उत्तर तीन चीजों पर निर्भर करता है।
प्रथम,संबंधित शहर में कितने वर्ष रहने की आपकी योजना है? मकान या फ्लैट खरीदने का तभी कोई अर्थ बनता है जब आप कम से कम सात से दस साल वहां रहने का इरादा रखते हों। यदि इसकी बड़ी संभावना है कि आप पांच साल में उस शहर से अन्यत्र निकल जाएंगे, तो किराए पर रहने में समझदारी होगी।
द्वितीय, मकान खरीद और किराए का अनुपात आपके शहर में क्या है? समान फ्लैट के वार्षिक किराए का उसकी खरीद के कुल मूल्य से भाग दीजिए। यदि प्राप्त होने वाली राशि 20 या अधिक है तो किराए पर रहना सस्ता पड़ेगा। मुंबई और दिल्ली में यह अनुपात 35 से 40 तक पहुंच जाता है, जिसकी वजह से खरीद का निर्णय लोगों उचित लगता है। यह एक आंकड़ा आपको किसी ब्रोकर की तुलना में अधिक जानकारी देगा।

तृतीय, मकान या फ्लैट की खरीद से आपकी अन्य वित्तीय योजनाओं पर क्या फर्क पड़ता है। यदि डाउन पेमेंट करने से आपका इमरजेंसी फंड खत्म हो जाता है, ईएमआई के बाद अन्य किसी निवेश या इंश्योरेंस की गुंजाइश समाप्त हो जाती है। यदि इस खरीद से आपके बच्चों की शिक्षा के लिए की जाने वाली बचत पांच साल पीछे चली जाती है, तब ये समझना चाहिए कि जिस मकान से सुरक्षा की अपेक्षा रखते हैं, उसे लेने के बाद भविष्य को लेकर असुरक्षा का भाव पनप सकता है।

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घर एक परिसंपत्ति है, पर उसमें तरलता नहीं होती। उसे अपने निवेश के एक हिस्से की तरह देखें, ना कि संपूर्ण पोर्टफोलियो निवेश की भांति। एक और बात पर ध्यान देना चाहिए, खासकर महिलाओं को। चाहे आप किराए पर रहती हों या मकान मालिक हों, कागजों पर आपके नाम का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए। यदि आप मकान खरीदती हैं तो कागजों पर आपके नाम का उल्लेख महज एक औपचारिकता नहीं है। ये कानूनी सुरक्षा भी है, लोन के लिए इससे पात्रता सुनिश्चित होती है और बहुत से राज्यों में महिलाओं के नाम पर रजिस्ट्री होने पर स्टांप ड्यूटी में भी एक या दो प्रतिशत की बचत होती है। यदि किराए पर रहती हैं तो भी रेंट एग्रीमेंट में आपके नाम के उल्लेख से उस स्थान पर अधिकार सुनिश्चित होते हैं।
इस हफ्ते, होम लोन ईएमआई कैलकुलेटर खोलें और उसपर वांछित धनराशि अंकित करें। आपका शहर, प्रापर्टी की कीमत, डाउन पेमेंट राशि पर भी बहुत कुछ निर्भर करता है। इस बात पर ईमानदारी से विचार करें कि ईएमआई के बाद आपके पास अन्य खर्चों के लिए कितनी राशि बचेगी। यही आपके निर्णयों का आधार होना चाहिए।
लक्ष्मी आपसे सबसे आलीशान घर का निर्माण करने के लिए नहीं कहतीं, बल्कि ये चाहती हैं कि आपका जीवन सुरक्षित रहे।
आपके सवालों से इस स्तंभ को आकार मिलेगा। हमें ईमेल करें- iamolaxmi@gmail.com

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