जब मुश्किल समय में ढाल बनी ज्वॉइंट फैमिली, परवरिश की बदल दी परिभाषा

कोरोना-काल और लॉकडाउन का दौर हम सभी के लिए एक कड़ा इम्तिहान था, लेकिन इसका सबसे गहरा असर मासूम बच्चों के मानसिक विकास और उनकी सामाजिक जिंदगी पर पड़ा। स्कूल बंद होने और घरों में कैद रहने के कारण बच्चे न सिर्फ दोस्तों से दूर हो गए, बल्कि वे मोबाइल स्क्रीन की लत का भी शिकार हो गए। ऐसे समय में ज्वॉइंट परिवार बच्चों के लिए एक सुरक्षा कवच बनकर उभरा, जिसने माता-पिता की जिम्मेदारियों को बांटकर बच्चों की परवरिश को संभाला।
गाजियाबाद की रहने वाली श्रेया इस मामले में खुद को बहुत खुशनसीब मानती हैं वह कहती हैं कि मेरी इकलौती बेटी अयाना की परवरिश संयुक्त परिवार में हो रही है। ऐसे में उसे मम्मी-पापा के अलावा परिवार के अन्य सदस्यों का भी भरपूर प्यार और मार्गदर्शन मिलता है।
वह समय कभी नहीं भलूंगी
कोविड काल के पिछले तीन वर्ष बच्चों और पेरेंट्स के लिए बहुत मुश्किल थे। जब पहला लॉकडाउन लगा था, उस वक्त मेरी बेटी अयाना की उम्र मात्र चार वर्ष थी। उसने नर्सरी स्कूल में जाना शुरू ही किया था, तभी तेजी से फैलते संक्रमण की वजह से देशव्यापी लॉकडाउन की घोषणा हो गई। मेरी बेटी स्कूल और पास-पड़ोस में नए दोस्त बनाना सीख ही रही थी, लेकिन कोविड संक्रमण की वजह से यह प्रक्रिया थम सी गई।

उसके स्कूल से ऑनलाइन क्लासेस जरूर होती थीं, जिसमें परिवार के किसी सदस्य का साथ बैठना जरूरी होता था। पर मेरे विचार से बच्चों के व्यक्तित्व विकास के लिए पढ़ाई का यह तरीका पर्याप्त नहीं था। फिर एक दौर ऐसा भी आया कि हमारे परिवार के सभी सदस्य एक साथ संक्रमित हो गए। बच्ची को इससे बचाने के लिए यह बहुत जरूरी था कि उसे आइसोलेशन में रखा जाए। वह बहुत कठिन वक्त था।
हमारी बेटी एक कमरे में बंद थी और हम वीडियो कॉल के माध्यम से उसे बिस्तर ठीक करने, बाल बनाने और अपने लिए सही कपड़ों का चुनाव करने में उसकी मदद करते थे। सोने से पहले दादी उसे फोन पर ही बेड टाइम स्टोरीज सुनाती थीं। खाने की व्यवस्था बाहर से होती थी। लॉकडाउन के दौरान वर्क फ्रॉम होम के कारण हमें लगभग 24 घंटे मेल और मैसेज के माध्यम से अपने ऑफिस के संपर्क में रहना पड़ता था।
वैसे तो, दादी और बुआ अयाना का बहुत ख्याल रखती हैं, लेकिन माता-पिता होने के नाते हमारे लिए भी यह बहुत जरूरी था कि हम अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाह करें। जब हम लोगों की रिपोर्ट नेगेटिव आ गई, तो हमने राहत की सांस ली। उसके बाद ऑनलाइन क्लासेस के अलावा हमने उसे खुद भी घर पर पढ़ाना शुरू किया। मैं नियमित रूप से उसके साथ बातचीत करती हूँ। उस दौरान चारों ओर से नकारात्मक खबरें सुनने को मिल रही थीं, ऐसे में जिज्ञासावश बच्चों के मन में कई सवाल उठते थे। तब मैं सरल भाषा में उसे सेहत और स्वच्छता के नियमों के बारे में बताती थी।
स्क्रीन टाइम किया कम
उन दिनों एक बड़ी समस्या यह भी थी कि ऑनलाइन क्लासेस के बहाने बच्चों में मोबाइल के साथ ज्यादा वक्त बिताने की लत लग चुकी थी। मैंने नोटिस किया कि मेरी बेटी को भी मोबाइल का साथ ज्यादा पसंद आने लगा था। यह लत बच्चों की आंखों के लिए नुकसानदेह होती है। इसकी वजह से उनकी नींद भी पूरी नहीं होती, जिससे उन्हें सिरदर्द और चिड़चिड़ापन जैसी समस्याएं परेशान करती हैं।
इसलिए मैंने अपनी बेटी के लिए मोबाइल देखने की निश्चित समय सीमा निर्धारित की, ताकि उसकी आंखों पर बुरा असर न पड़े। हालांकि, लॉकडाउन के बाद अब बच्चों के स्कूल खुल चुके हैं, फिर भी तीन वर्षों तक लोगों से अलग-थलग रहने के बाद उनमें ऐसी आदतें बन गई हैं कि वे अब हमउम्र बच्चों के साथ नए सिरे से दोस्ती नहीं कर पाते। अपनी बेटी को ऐसी समस्या से बचाने के लिए मैं अक्सर उसे अपने फैमिली फ्रेंड्स और उन रिश्तेदारों के घर लेकर जाती हूं, ताकि उसे हमउम्र बच्चों से दोस्ती करने का मौका मिले। मेरी यह कोशिश काफी हद तक कामयाब रही है।
परवरिश के जरूरी नियम
- बच्चों को एक्टिविटी क्लासेस में भेजें।
- दोस्तों के साथ अच्छा व्यवहार सिखाएं।
- दोपहर को थोड़ी देर सोने का मौका दें।
- उनकी सेल्फ स्टडी पर ध्यान दें।
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- सखी फीचर्स
Images: magnific
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