Jagran Film Festival 2026 की नई पहल, कॉरपोरेट ऑफिस बना सिनेमा का मंच

जब परदे पर हम कोई कहानी देखते हैं, तो फिल्म खत्म होने के बाद कुछ कहानियां वहीं थियेटर्स में छूट जाती हैं, तो कुछ कहानियां हम दिल में बसाकर अपने साथ ले आते हैं। असल में यही मीनिंगफुल सिनेमा और प्रभावशाली कहानियों की पहचान है। सिनेमा महज पर्दे पर चलती तस्वीरों और कहानियों का नाम नहीं है। एक अच्छी फिल्म वही होती है, तो खत्म होने के बाद भी दर्शकों में भीतर चलती रहे...कभी उन्हें कुछ सोचने पर मजबूर कर दे...कभी उनकी यादों में बस जाए...कभी कोई गहरा संदेश उनके मन पर छोड़ दे, तो कभी कुछ सवालों का जवाब ढूंढने का ख्याल उनके मन में हिचगोले खाने लगे। इसी विचार को केंद्र में रखकर 'रजनीगंधा प्रेजेंट जागरण फिल्म फेस्टिवल 2026' सिनेमा को एक बड़े और सार्थक अनुभव के रूप में लोगों तक पहुंचा रहा है। दैनिक जागरण की इस प्रमुख पहल का उद्देश्य फिल्मों के जरिए ऐसी कहानियों और विचारों को लोगों तक पहुंचाना है, जिनका असर थिएटर से बाहर भी महसूस किया जा सके।
ऑफिस की भागदौड़ के बीच सिनेमा से जुड़ने का मौका
जागरण फिल्म फेस्टिवल की हमेशा से यह खासियत रही है कि वह वह महत्वपूर्ण फिल्मों को लोगों तक पहुंचाता रहा है, लेकिन इस बार, एक नई पहल की मदद से यह फेस्टिवल कॉर्पोरेट जगत तक भी पहुंच गया है। जागरण फिल्म फेस्टिवल सिनेमा को सिर्फ बड़े शहरों के थिएटर या ऑडिटोरियम तक सीमित नहीं रखता। सालों से फेस्टिवल ने ऐसी कहानियों को अलग-अलग दर्शकों तक पहुंचाने की कोशिश की है, जिनमें कुछ कहने, सोचने और समाज से संवाद करने की क्षमता है। स्वतंत्र फिल्मकारों की आवाज से लेकर दमदार कथाओं तक, इस पहल ने कई तरह के सिनेमा को नए दर्शकों से रूबरू कराया है। अब इसी सफर को एक कदम आगे बढ़ाते हुए फेस्टिवल ने कॉर्पोरेट वर्कस्पेस का रुख किया है। इस पहल के तहत ऑफिस में 'नमस्ते सर' की स्क्रीनिंग आयोजित की गई।

ऑफिस कर्मचारियों को मिला खास मौका
रोजाना की मीटिंग्स, टारगेट्स और डेडलाइन्स के बीच यह स्क्रीनिंग कर्मचारियों के लिए सिर्फ फिल्म देखने का अवसर नहीं थी, बल्कि रुककर कहानी को महसूस करने और उस पर विचार करने का एक मौका भी बनी। फिल्म के जरिए ऑफिस के माहौल में संवाद और आत्ममंथन की ऐसी जगह बनी, जहां लोगों ने अपने विचार और अनुभव भी साझा किए। असल में Jagran Film Festival ने Meaningful Cinema को वर्कप्लेस तक पहुंचाकर सिनेमा को मनोरंजन से आगे, संवाद और जुड़ाव का जरिया बनाने की कोशिश की है।
कैसे हुई 'जागरण फिल्म फेस्टिवल' की नई पहल की शुरुआत?
जागरण फिल्म फेस्टिवल की नई पहल की शुरुआत के लिए फरीदाबाद के सेक्टर 35 के एक बड़े आर्किटेक्चर और इंटीरियर डिजाइन स्टूडियो 'संस्कृति चंद्रक आर्किटेक्ट' को चुना गया। यूं तो इस स्टूडियो की पहचान वहां के 150 आर्किटेक्ट्स, डिजाइनर्स और क्रिएटिव प्रोफेशनल्स हैं, लेकिन इस खास अवसर पर यहां हर तरह बस सिनेमा ही नजर आ रहा था। यहां बात सिर्फ फिल्म की स्क्रीनिंग की नहीं थी, बल्कि उसकी कहानी, इमोशंस और मैसेजेस पर होने वाली एक खास बातचीत की थी, जो वहां के एम्पलॉईज की बीच नजर आई। इसके बाद यह कारवां 19 जून को 'मैड इन्फ्लुएंस में पहुंचा। यहां क्रिएटर्स रोजाना ही ब्रांड और डिजिटल कंटेट के जरिए कोई न कोई कहानी कहते हैं, लेकिन जब सिनेमा वहां पहुंचा, तो कहानी और बातचीत का नजरिय सब बदल गया। जैसा हमने जिक्र किया कि प्रभावशाली कहानियां वो होती हैं, तो खत्म होने के बाद भी हमारे अंदर रहती हैं और यहां भी बातचीत में यही बात सामने आई की एक मीनिंगफुल सिनेमा न केवल रिश्तों को मजबूत कर सकता है, इमोशंस को बाहर लाने में मदद कर सकता है, बल्कि प्रोफेशनली भी हमें मजबूत बना सकता है।

वो कहानियां जो छोड़ती हैं अपना प्रभाव...
जागरण फिल्म फेस्टिवल का यह कारवां आगे बढ़ते हुए 11 जुलाई को एक्का इलेक्ट्रॉनिक पहुंचा। एक ऐसी जगह जहां आमतौर पर तकनीकों का जिक्र होता है, वहां कुछ वक्त के लिए मानो वक्त ही थम गया और चर्चा का रूख इनोवेशन या टेक्नोलॉजी नहीं, बल्कि कहानी बन की तरफ मुड़ गया। यह बदलाव वहां के कर्मचारियों के लिए भी काफी अनूठा रहा क्योंकि उनके लिए ये रोजमर्रा के रूटीन से कुछ हटकर करने और सीखने का मौका था। इसके बाद 'नमस्ते सर' की स्क्रीनिंग 15 जुलाई को सैक्टर 63 नोएडा के बैकस्पेस को-वर्किंग में हुई। यहां भी को-वर्कर साथ में फिल्म देखने के लिए इकट्ठा हुए और धीरे-धीरे मीनिंगफुल सिनेमा ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया।
सिर्फ थियेटर्स तक सीमित नहीं है सिनेमा
'जागरण फिल्म फेस्टिवल' की इस पहल ने यह साफ कर दिया है कि मीनिंगफुल सिनेमा सिर्फ थियेटर्स तक सीमित नहीं रहता है, बल्कि एक कहानी में इतनी ताकत होती है कि वो वर्कप्लेस पर लोगों के रिश्तों को मजबूत कर सके, उन्हें बातचीत के लिए प्रेरित कर सके। बेहतर कहानियां केवल कही या सुनी नहीं जाती हैं, बल्कि महसूस की जाती हैं और जब वो दिल में उतरती हैं, तो उनका असर साफ नजर आता है और यही जागरण फिल्म फेस्टिवल का मिशन रहा है, जो देश के अलग-अलग हिस्सों में अपने सफर पर आगे बढ़ रहा है। इसका मकसद काफी सटीक तरह से चुनी गई फिल्मों की स्क्रीनिंग, फिल्म जगत की बड़ी हस्तियों के साथ डिस्कशन और ऑडियंस के बातचीत का मौका देना है ताकि कहानी कहने की कला को समझा जा सके।
'जागरण फिल्म फेस्टिवल' की खास है पहचान
'जागरण फिल्म फेस्टिवल' सिर्फ फिल्मों की स्क्रीनिंग के बारे में नहीं है, बल्कि यह बताता है कि कैसे कहानियां कहना एक कला है, उनसे जुड़ी बातचीत को बढ़ावा देना कितना जरूरी है और कैसे मीनिंगफुल सिनेमा जिंदगी को बदल सकता है। एक अच्छी कहानी, एक बेहतरीन सिनेमा वो होता है, तो हमारे साथ रह जाए...हमारे दिल में उतर जाए....परदे पर उस कहानी के खत्म होने के बाद भी हम अपने अक्स को उसके अंदर देख पाएं।
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