वृंदावन का एक ऐसा पवित्र धाम जहां आज भी थमा हुआ है वक्त, कलयुग का प्रवेश है वर्जित; जानें मोबाइल और घड़ी ले जाना क्यों है मना?
-1775121780883.png)
आज के शोर-शराबे से भरी इस दुनिया में अगर आप शांति और सुकून चाहती हैं, तो वृंदावन का 'टटिया स्थान (Tatiya Sthan)' आपके लिए किसी वरदान से कम नहीं है। 21वीं सदी में होने के बावजूद, यह पावन धाम आज भी द्वापर युग की सादगी और पवित्रता को संजोए हुए है। यहां के लिए कहते हैं कि मोबाइल और घड़ी ले जाना मना है। ऐसे में इस मंदिर के बारे में सबकुछ पता होना जरूरी है। आज का हमारा लेख इसी विषय पर है। आज हम आपको अपने इस लेख के माध्यम से बताएंगे कि वृंदावन का ऐसा कौन-सा मंदिर है, जहां आज भी बिजली नहीं है। पढ़ते हैं आगे...
कलयुग से दूर जाना है तो...
वृंदावन के इस खास स्थान के बारे में कहते हैं कि यहां आज भी कलयुग का प्रभाव नहीं पहुंचा है। जहां दुनिया तकनीक और गैजेट्स के पीछे भाग रही है, वहीं टटिया स्थान में भक्त आज भी ब्रज की रज में बैठकर भजन-कीर्तन करते हैं।
-1775122192692.png)
यहां मोबाइल फोन, कैमरा और यहां तक कि घड़ी ले जाना भी वर्जित है, ताकि भक्त समय और दुनियादारी के बंधनों को छोड़कर पूरी तरह प्रभु की भक्ति में लीन हो सकें।
इसे भी पढ़ें - क्या आप जानती हैं भारत में हजार मंदिरों वाली नगरी कहां है? एक बार जरूर देख आएं यहां का नजारा
क्यों इलेक्ट्रॉनिक उपकरण नहीं ले जा सकते?
टटिया स्थान की सबसे अनोखी बात यह है कि यहां बिजली का उपयोग बिल्कुल नहीं किया जाता। इसके पीछे छिपी एक बेहद भावुक और प्यारी मान्यता है। कहते हैं कि यहां भगवान श्रीकृष्ण की सेवा उनके बाल रूप में की जाती है। भक्तों का मानना है कि बिजली की चकाचौंध और तेज रोशनी से 'लाला' यानि कृष्ण जी की कोमल आंखों को परेशान कर सकती हैं। इसलिए, शाम ढलते ही पूरे परिसर को शुद्ध घी के दीयों से रोशन किया जाता है, जो आपको सीधे द्वापर युग के वातावरण का अनुभव कराता है।
-1775122214858.png)
स्वामी हरिदास जी की विरासत
मान्यता है कि यह स्थान स्वामी हरिदास संप्रदाय से जुड़ा है। स्वामी हरिदास वही महान संत थे, जिन्होंने अपनी संगीत साधना से साक्षात् बांके बिहारी जी को प्रकट किया था। यहां आज भी प्रकृति के साथ गहरा जुड़ाव देखने को मिलता है। संत और भक्त बिना पंखे या एसी के रहते हैं और ठाकुर जी की सेवा के साथ-साथ गौ-सेवा और संत-सेवा को ही अपना परम धर्म मानते हैं।
नाम के पीछे की कहानी क्या है?
'टटिया' शब्द का स्थानीय भाषा में अर्थ होता है, बांस की लकड़ियों का घेरा। चूंकि यह पूरा परिसर बांस की बाड़ (डंडों) से घिरा हुआ है, इसलिए इसे 'टटिया स्थान' कहा जाता है।
इसे भी पढ़ें - Daadh Devi Mandir: कोटा का हजार साल पुराना चमत्कारी दाढ़ देवी मंदिर, कुंड के पानी से खेत रहते हैं हरे-भरे; जानिए इसका रहस्य और इतिहास
अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
Images: Freepik/shutterstock
हमारा उद्देश्य अपने आर्टिकल्स और सोशल मीडिया हैंडल्स के माध्यम से सही, सुरक्षित और विशेषज्ञ द्वारा वेरिफाइड जानकारी प्रदान करना है। यहां बताए गए उपाय, सलाह और बातें केवल सामान्य जानकारी के लिए हैं। किसी भी तरह के हेल्थ, ब्यूटी, लाइफ हैक्स या ज्योतिष से जुड़े सुझावों को आजमाने से पहले कृपया अपने विशेषज्ञ से परामर्श लें। किसी प्रतिक्रिया या शिकायत के लिए, compliant_gro@jagrannewmedia.com पर हमसे संपर्क करें।