आज के समय महिलाएं हर एक फील्ड में पुरूषों से कदम से कदम मिलाकर चल रही हैं। वे न केवल अपने होमटाउन बल्कि शहर से बाहर निकालकर नौकरियां कर रही हैं, बड़े पदों पर कार्यरत हैं। इतना ही नहीं, वे अपनी मेहनत और काबिलियत के दम पर लाखों रुपये कमा रही हैं। हमारी सोसायटी में इसे अपने पैरों पर खड़ा होना या वित्तीय स्वतंत्रता कहते हैं। यह शब्द जब सामने आता है कि तो बड़े-बुजुर्ग या फिर आस-पास रहने वाले लोगों को लगने लगता है कि अब यह पूरी तरह से आजाद है। मगर असल में जमीनी हकीकत आज भी बहुत अलग है। हमारे देश में ऐसी अनगिनत महिलाएं हैं जो आर्थिक रूप से तो आत्मनिर्भर हैं, लेकिन जब अपनी ही मेहनत की कमाई को खर्च करने, बचाने या इंवेस्ट करने की बात आती है, तो उनके पास कोई अधिकार नहीं होता।

इतना ही नहीं, बल्कि खुद की जिंदगी के फैसले भी नहीं ले सकती हैं। आज के इस लेख में हम आपको बताने जा रहे हैं कि आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के बावजूद भी कई महिलाएं असल मायनों में क्यों आजाद नहीं हो पाई हैं।

पितृसत्तात्मक सोच का असर

जैसा कि हम सभी को यह पता है कि हमारा समाज पितृसत्तात्मक है। इस व्यवस्था ने हमारे समाज के दिलों-दिमाग में यह बात बिठा दी है कि पैसे का प्रबंधन फैमिली ही करेगी।

बचपन से ही लड़कियों को सिखाया जाता है कि घर के वित्तीय मामलों में उनका दखल नहीं होना चाहिए। यही वजह है कि नौकरी करने और कमाने के बावजूद कई महिलाएं खुद को वित्तीय मामलों में कमतर समझती हैं। उन्हें लगता है कि निवेश या बड़े खर्चों का फैसला पुरुष ही बेहतर ले सकते हैं और यह सोच उन्हें मानसिक रूप से किसी और पर निर्भर बनाए रखती है।

इसे भी पढ़ें- स्टाइल भी, सुकून भी; जानें कैसे पुरानी सोच की बेड़ियां तोड़ आगे निकल आईं महिलाएं?

कमाई पर परिवार का नियंत्रण

कई परिवारों में महिलाएं काम पर तो जाती हैं, लेकिन उनके वेतन का बैंक खाता और उसकी चाबी उनके पति या ससुराल वालों के हाथ में होती है। उन्हें अपनी जरूरतों, पर्सनल केयर या शौक के लिए भी अपने ही पैसे में से घर के पुरुषों से इजाजत मांगनी पड़ती है। कई मामलों में तो महिलाओं का वेतन सीधे उनके पति या ससुर के खाते में ट्रांसफर करवा लिया जाता है या फिर क्रेडिट कार्ड पुरुषों के नियंत्रण में रहते हैं।

भावनात्मक रूप से अच्छी बेटी या पत्नी बनने का दबाव

आज की महिलाएं शिक्षित होकर बेहतरीन करियर बना रही हैं और अच्छी कमाई भी कर रही हैं, लेकिन इसके बावजूद वे अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेने में हिचकिचाती हैं।

इसकी सबसे बड़ी वजह बचपन से मिलने वाली सामाजिक कंडीशनिंग और भावनात्मक दबाव है। समाज उन्हें हमेशा त्याग, समझौता और दूसरों की खुशी को प्राथमिकता देने का पाठ पढ़ाया जाता है। अगर कोई महिला अपने पैसों का हिसाब-किताब खुद रखने की मांग करती है या अपने हिसाब से खर्च करने की जिद करती है, तो उसे स्वार्थी, घमंडी या परिवार को तोड़ने वाली का टैग दे दिया जाता है।

इस ताने से बचने और रिश्तों के बीच शांति बनाए रखने के लिए महिलाएं इसके खिलाफ नहीं बोलती है। साथ ही अपनी कमाई का नियंत्रण और अपने जीवन के फैसले अपने परिवार या पति के हाथों में सौंप देती हैं।

इसे भी पढ़ें- 'मैं पराया धन नहीं हूं', विवाह की सदियों पुरानी रस्म Kanyadaan पर नई पीढ़ी के बदलते विचार

अब असल में सवाल आता है कि हम भले ही खुद को कितना ही मॉडर्न क्यों न कह लें, लेकिन आज भी कई महिलाएं अपने जीवन के फैसले खुद नहीं ले पाती हैं। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहे हर जिंदगी से।

Image Credit- Magnific, AI