करवा चौथ का पर्व हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। इस वर्ष यह व्रत 29 अक्टूबर को मनाया जाएगा। इस मौके पर लड़कियां और सुहागिन महिलाएं निर्जला उपवास रखती हैं। शाम को चांद निकलने से पहले महिलाएं सोलह श्रृंगार करती हैं और चांद निकलने के बाद छलनी से चांद देखकर व्रत तोड़ती है। मगर क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर चांद को सीधे देखने के बजाय छलनी से देखने की परंपरा कैसे शुरू हुई? नीचे लेख में जानें इसके पीछे का मुख्य कारण और परंपरा क्या है?

छलनी से चांद देखने की रस्म का क्या है महत्व?

करवा चौथ पर महिलाएं निर्जला व्रत रखती हैं और शाम को चंद्रमा दिखाई देने के बाद पूजा करती हैं, अर्घ्य देती हैं और फिर छलनी से चांद को देखती हैं। इसके बाद उसी छलनी से अपने पति का चेहरा देखकर व्रत खोलती हैं। कई परिवारों में इस रस्म के दौरान पति अपनी पत्नी को पानी पिलाकर व्रत पूरा करवाते हैं। इस परंपरा को पति-पत्नी के प्रेम, विश्वास और साथ का प्रतीक माना जाता है।

पति की लंबी उम्र से कैसे जुड़ी है छलनी से चांद देखने की मान्यता?

करवा चौथ का व्रत पारंपरिक रूप से पति की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और वैवाहिक जीवन की सुख-समृद्धि की कामना से जुड़ा है। धार्मिक मान्यता के अनुसार, व्रत रखने वाली महिलाएं चंद्रमा की पूजा करके अपने पति के लिए मंगलकामना करती हैं। महिला जब छलनी से चांद देखने के बाद पति का चेहरा देखती है, तो इसे अपने जीवनसाथी के प्रति प्रेम और समर्पण की अभिव्यक्ति के रूप में समझा जाता है। ऐसे में सवाल आता है कि छलनी से चांद देखने का महत्व है। नीचे जानें-

वीरवती की कथा से जुड़ा है छलनी का महत्व

छलनी से चांद देखने की परंपरा को समझने के लिए वीरवती की पौराणिक कथा का जिक्र किया जाता है। लोकमान्यता के अनुसार, वीरवती नाम की एक महिला ने अपने पति की लंबी उम्र के लिए करवा चौथ का व्रत रखा था। दिनभर भूखी-प्यासी रहने के कारण शाम तक उसकी हालत कमजोर होने लगी। अपने बहन की परेशानी देखकर उसके भाइयों ने उसे भोजन करवाने के लिए एक उपाय सोचा।

कथा के अनुसार, भाइयों ने दूर एक पेड़ पर दीपक जलाकर उसके सामने छलनी रख दी, जिससे रोशनी चांद जैसी दिखाई देने लगी। वीरवती ने उसे चांद समझ लिया और व्रत खोल लिया। इसके बाद उसके पति की तबीयत बिगड़ने और मृत्यु होने की बात कथा में बताई जाती है। बाद में वीरवती ने पूरी श्रद्धा से व्रत किया और अपने पति को दोबारा जीवित करने का वरदान प्राप्त किया। इस कथा को करवा चौथ पर छलनी से चांद देखने की रस्म के पीछे बताई जाने वाली प्रमुख लोककथाओं में गिना जाता है।

डिस्कलेमर

छलनी से चांद देखने की रस्म के पीछे कोई एक सर्वमान्य ऐतिहासिक प्रमाण नहीं मिलता, जिससे यह निश्चित रूप से बताया जा सके कि इसकी शुरुआत कब और कहां हुई। हालांकि, समय के साथ यह करवा चौथ की पहचान बन गई है और कई परिवारों में पीढ़ियों से निभाई जा रही है। अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।

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