‘चिट्टा कुक्कड़ बनेरे ते’, ‘लट्ठे दी चादर’ और ‘काला शाह काला’ जैसे पंजाबी गानों का नाम सुनते ही पैर अपने आप थिरकने लगते हैं। इन गानों की धुन, लिरिक्स यानी बोल और गाने का अंदाज ही कुछ ऐसा है कि इन्हें सुनने का मन बार-बार करता है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि पंजाबी संगीत में ऐसा क्या खास होता है, जो इन्हें बाकी गानों से अलग बना देता है?
दरअसल, इसका एक मजेदार कनेक्शन टप्पा गायकी से है, जो पंजाब के लोकसंगीत से निकली है। इस गायकी की खासियत यह है कि इसमें गाते समय बहुत तेजी से तानें ली जाती हैं और आवाज को बहुत जल्दी ऊपर-नीचे किया जाता है। ऐसे में आइए जानते हैं कि आखिर टप्पा क्या होता है, इसकी शुरुआत कैसे हुई और पंजाबी संगीत से इसका क्या कनेक्शन है।
image credit- magnific
टप्पा गायकी क्या है और इसकी क्या खासियत है?
टप्पा हिंदुस्तानी गाने का एक ऐसा तरीका है, जिसमें शास्त्रीय संगीत यानी क्लासिकल म्यूजिक और लोकसंगीत दोनों की झलक देखनपे को मिलती है। इसकी सबसे बड़ी खासियत है गाने की स्पीड और आवाज को बहुत तेजी से ऊपर-नीचे ले जाना। टप्पा गाते समय सिंगर्स छोटे-छोटे सुरों को बहुत तेजी से लेते हैं। आवाज में अचानक आने वाले उतार-चढ़ाव ही इसे बाकी गानों से बिल्कुल अलग बनाते हैं। इसमें मुरकी, खटका और जमजमा जैसी तकनीकों का यूज होता है, जिससे गाने में एक अलग ही वाइब आ जाती है।
यह भी पढ़ें- 'भाभो कहंदी ए पियारा सिंघा, वेलना लिआ...' आखिर भाभो और वेलना का सच क्या है? इस पंजाबी गिद्दे का है मजेदार मतलब
आपको बता दें कि टप्पा गाना कोई आसान काम नहीं है। इसके लिए आवाज पर पूरा कंट्रोल, सांस को सही से संभालना और खूब प्रैक्टिस चाहिए होती है। सुनने में भले ही यह बहुत तेज और जोश से भरा लगे, लेकिन इसे सही से गाने के लिए बहुत मेहनत लगती है।
पंजाब के ऊंट चालकों से कैसे जुड़ी टप्पा की कहानी?
बताया जाता है कि टप्पा की शुरुआत पंजाब और सिंध इलाके के ऊंट चलाने वालों के लोकगीतों से हुई थी। पुराने जमाने में जब ऊंटों के काफिले एक जगह से दूसरी जगह जाते थे, तो लंबे सफर में ऊंट चलाने वाले रास्ते भर गाना गाते रहते थे। कहते हैं कि ऊंट के चलने की चाल और सफर के झटकों के हिसाब से इन गानों की स्पीड भी बदलती रहती थी। धीरे-धीरे इसी अंदाज से टप्पा गायकी की शुरुआत हुई।
यह भी पढ़ें- 'केसरिया बालम' सिर्फ राजस्थानी लोकगीत नहीं, ढोला-मारू के प्यार और इंतजार की पुकार है! पढ़ें इसकी दिलचस्प कहानी
गुलाम नबी शोरी ने टप्पा गायकी को बनाया खास
गुलाम नबी शोरी (जिन्हें लोग शोरी मियां के नाम से भी जानते हैं) ने टप्पा गायकी को शास्त्रीय संगीत की दुनिया में एक बड़ी पहचान दिलाई थी। वह 18वीं सदी में अवध के नवाब आसफ-उद-दौला के दरबार के जाने-माने गायक थे। शोरी मियां ने पंजाब के लोकगीतों से आइडिया लेकर इस गायकी को बिल्कुल नया रूप दे दिया था। उस जमाने में राज-दरबारों में संगीत को बहुत बढ़ावा मिलता था। तभी गायकों के जरिए टप्पा एक जगह से दूसरी जगह पहुंचता गया और पॉपुलर हो गया।
image credit- magnifi
'लट्ठे दी चादर' और 'काला शाह काला' जैसे गानों का टप्पा से क्या कनेक्शन है?
'लट्ठे दी चादर', 'काला शाह काला' और 'चिट्टा कुक्कड़ बनेरे ते' जैसे गाने पंजाबी लोकसंगीत की जान हैं। इन गानों में पंजाब की कल्चर, वहां के लोगों का रहन-सहन और म्यूजिक का असली रंग देखने को मिलता है। हालांकि, हर पंजाबी गीतों को टप्पा नहीं कहा जा सकता है। क्योंकि टप्पा गाने की एक खास क्लासिकल स्टाइल है, जबकि पंजाबी लोकसंगीत बहुत बड़ा है और उसमें कई तरह के गाने आते रहते हैं।
यह भी पढ़ें- रोमांटिक लगने वाला 'अंबरसरीया' असल में है पंजाबी लोकगीत, गाने में गली के छैल-छबीले की क्लास लगाती है कुड़ी
अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
Image Credit- Magnific
