जन्माष्टमी का त्योहार आज पूरे देश में धूमधाम से मनाया जा रहा है। इस दिन भक्त श्रीकृष्ण की भक्ति में डूब जाते हैं, लेकिन कान्हा की स्मरण राधा रानी का नाम लिए बिना पूरा नहीं हो सकता है। आपने अक्सर लोगों को 'राधे-कृष्ण', 'राधे-राधे' या 'राधा-कृष्ण' कहते हुए सुना होगा, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि भगवान कृष्ण का नाम लेने से पहले राधा का नाम क्यों लिया जाता है? इसके पीछे कई धार्मिक मान्यताएं और अद्भुत रहस्य छुपा है। चलिए आज आपको इसके बारे में बताते हैं।

राधा नाम से प्रसन्न होते हैं श्रीकृष्ण

कई पौराणिक कथाओं में वर्णन है कि भगवान श्रीकृष्ण राधा रानी का नाम लेने से प्रसन्न होते हैं और भक्तों पर कृपा करते हैं। उन्होंने स्वंय राधा को अपनी आत्म बताया है और कहा है कि राधा उन्हीं में वास करती हैं। राधा रानी को भगवान श्रीकृष्ण की शक्ति माना जाता है। कहते हैं कि जिस तरह सूर्य और उसकी किरणें अलग नहीं हैं, उसी तरह राधा और कृष्ण भी एक-दूसरे के पूरक माने जाते हैं। राधा-कृष्ण का प्रेम साधारण प्रेम नहीं है, बल्कि दोनों एक-दूसरे के बिना अधूरे हैं। जब भी कोई भक्त राधा नाम भजता है, तो उसे श्रीकृष्ण की कृपा जरूर मिलती है।

राधा नाम में छिपा है प्रेम और भक्ति का भाव

राधा-कृष्ण की कथा में राधा को निष्काम और पूर्ण प्रेम का प्रतीक माना जाता है। उनका प्रेम किसी सांसारिक अपेक्षा से जुड़ा नहीं था, इसलिए कृष्ण भक्ति में राधा नाम को विशेष महत्व दिया गया है।

राधा की कृपा से ही मिलते हैं कृष्ण

ऐसी मान्यता भी है कि राधा रानी भगवान कृष्ण की परम प्रिय हैं। भक्त मानते हैं कि जो व्यक्ति राधा का स्मरण करता है, उस पर राधा रानी की कृपा होती है और उनके माध्यम से श्रीकृष्ण भी उसी इच्छाओं को पूरा करते हैं। कई धार्मिक कथाओं में इस बात का भी वर्णन है कि श्रीकृष्ण ने राधा रानी को स्वंय ये वरदान दिया था कि उनका नाम हमेशा कृष्ण के नाम से पहले लिया जाएगा और जो भक्त उनकी भक्ति करेगा, वो उसकी पुकार जरूर सुनेंगे। इसी भाव के कारण वृंदावन और बरसाना की गलियों में आज भी श्रद्धालु एक-दूसरे का अभिवादन 'राधे-राधे' कहकर कहते हैं।

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