हर इंसान अपने जीवन में प्यार और स्नेह पाना चाहता है, लेकिन सबके लिए इसे आसानी से स्वीकार कर पाना मुमकिन नहीं होता। कुछ लोग किसी का करीब आना और प्यार जताना खुशी-खुशी अपना लेते हैं, वहीं कई लोग किसी के बेहद करीब आते ही घबराने लगते हैं या असहज हो जाते हैं। इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि उन्हें प्यार की जरूरत नहीं है। असल में, अपने पुराने और कड़वे अनुभवों के कारण वे खुद को रिश्तों से दूर करने लगते हैं। ऐसे में हम कह सकते हैं कि प्यार की परिभाषा सभी के लिए अलग-अलग होती है। आखिर क्यों लोग प्यार को स्वीकार करने से डरते हैं, इसके बारे में पता होना जरूरी है। इस जवाब के लिए हमने कोच, हीलर, लाइफ अल्केमिस्ट और साइकोथेरेपिस्ट डॉ. चांदनी तुगनैत (Dr. Chandni Tugnait) से भी बात की है। जानते हैं, इसके बारे में...

आखिर क्यों रिश्ते से दूर भागते हैं लोग?

हर व्यक्ति के लिए प्यार का मतलब और उसका अहसास एक जैसा नहीं होता। हम प्यार को किस नजरिए से देखते हैं, यह बहुत हद तक हमारे बचपन, पारिवारिक माहौल और पुराने रिश्तों पर निर्भर करता है।

1. बचपन के माहौल का असर

अगर किसी का बचपन सुरक्षित और सहयोगी माहौल में बीता है, तो वह बड़े होकर भी रिश्तों में खुद को सुरक्षित महसूस करता है। वहीं, जिस व्यक्ति ने बचपन में तिरस्कार, आलोचना या मानसिक तनाव झेला हो, उसके लिए सच्चा प्यार अजनबी या डरावना सा लग सकता है। जब किसी को भावनात्मक सुरक्षा नहीं मिलती, तो उसके लिए सही और गलत रिश्ते की पहचान करना काफी मुश्किल हो जाता है।

2. जब अतीत का साया वर्तमान पर पड़ता है

मुश्किल दौर और कड़वे अनुभव इंसान के भावनात्मक व्यवहार को पूरी तरह बदल देते हैं। जिस व्यक्ति को बार-बार चोट पहुंची हो या दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा हो, वह मन ही मन यह मान लेता है कि भविष्य में भी उसके साथ ऐसा ही होगा।

3. शक करने की आदत

ऐसे लोग सच्चे प्यार पर भी शक करने लगते हैं। वे दूसरों से गहराई से जुड़ने से बचते हैं और खुद को अकेला या आत्मनिर्भर बनाए रखने की कोशिश करते हैं। असल में, ये लोग प्यार को खारिज नहीं कर रहे होते, बल्कि वे खुद को फिर से टूटने और अनजान दर्द से बचाने के लिए अपने चारों ओर एक सुरक्षा दीवार बना लेते हैं।

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4. नकारात्मक सोच का जन्म

अतीत के कड़वे अनुभव इंसान के मन में नकारात्मकता को जन्म देते हैं। लोग सोचने लगते हैं कि 'मुझे कोई प्यार नहीं कर सकता' या 'अगर मैं किसी पर निर्भर हुआ, तो मुझे फिर से धोखा मिलेगा।'

5. उलझन पैदा होना

यह सोच इंसान के अंदर एक अजीब सी उलझन पैदा कर देती है। एक तरफ उसका मन किसी के करीब जाना चाहता है, तो दूसरी तरफ डर उसे दूर भागने पर मजबूर करता है। रिश्तों में सुधार लाने के लिए सबसे पहले अपने इस व्यवहारिक पैटर्न को पहचानना बहुत जरूरी है।

इस परिस्थिति से कैसे लड़ें?

नकारात्मकता को दूर करने और परिस्थिति से लड़ने के लिए कुछ उपाय यहां बताए जा रहे हैं-

  • अपनी नकारात्मक सोच और खुद पर शक करने की आदत को धीरे-धीरे बदलें।
  • खुद को और दूसरों को देखने का एक नया, सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाएं।
  • सालों से दबाकर रखी गई भावनाओं को बाहर निकलने दें, इससे मन हल्का होता है।
  • खुद को स्वीकारना और खुद से प्यार करना सीखें, जिससे रिश्ता सुरक्षित महसूस होने लगेगा।
  • अगर यह डर आपके काबू से बाहर लग रहा हो, तो किसी प्रोफेशनल थेरेपिस्ट या काउंसलर की मदद जरूर लें।

निष्कर्ष

सच्चा प्यार पाने या स्वीकार करने के लिए किसी आदर्श साथी की तलाश करना ही काफी नहीं होता। सबसे ज्यादा जरूरी यह महसूस करना है कि आप खुद भी प्यार, सम्मान और खुशी के हकदार हैं। 

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Images: magnific