आज के समय में हमें अपने ही इतिहास के पन्नों को पलटने की जरूरत है। इतिहास हमें याद दिलाता है कि भारत सिर्फ झांसी की रानी जैसी वीरांगनाओं की भूमि नहीं रहा है। इस मिट्टी में एक ऐसी रानी भी जन्मी, जिसे बचपन में अपंग होने के कारण परिवार ने त्याग दिया था, लेकिन उसने उसी दिव्यांगता को अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया और पुरुषवादी सत्ता के सामने खड़े होकर आधी शताब्दी तक कश्मीर पर निष्कंटक राज किया। हम बात कर रहे हैं कश्मीर की जांबाज महारानी दिद्दा की।

'चुड़ैल रानी' के तमगे के पीछे छिपी पुरुषों की हार

इतिहास के पन्नों में कश्मीर की इस जांबाज महारानी दिद्दा को 'क्रूर' या 'चुड़ैल रानी' का दर्जा दिया गया, लेकिन यह उपाधि उनकी किसी बुराई के कारण नहीं, बल्कि उनके दिमागी कौशल का नतीजा थी। जी हां, जब साम्राज्य के बड़े-बड़े राजा और सामंत रानी दिद्दा की रणनीतिक चालों के आगे नतमस्तक हो जाते और युद्ध के मैदान या दरबार में मात खाते, तो अपनी हार और मर्दानगी के अहंकार को छिपाने के लिए उन्होंने दिद्दा को 'चुड़ैल' कहना शुरू कर दिया। दिद्दा ने इन तानों की परवाह न करते हुए साबित किया कि सत्ता का संचालन शारीरिक बनावट से नहीं, बल्कि तेज बुद्धि और इच्छाशक्ति से होता है।

जब खेला गया सती प्रथा का षड्यंत्र

जब दिद्दा के पति राजा क्षेमगुप्त की मृत्यु हुई, तो उनके विरोधियों और दुश्मनों ने रानी को सती प्रथा का हवाला देकर चिता पर जल जाने की सलाह दी। हालांकि, मंशा एकदम साफ थी, दिद्दा को रास्ते से हटाकर कश्मीर की गद्दी पर कब्जा करना, लेकिन रानी दिद्दा ने अपनी तीक्ष्ण बुद्धि से पूरे खेल की बाजी ही पलट दी। उन्होंने राजा की पहली पत्नी को सती होने का अवसर दिया और स्वयं सती होने से स्पष्ट इंकार कर दिया। अपने छोटे बेटे की संरक्षिका बनकर उन्होंने साम्राज्य को पूरी तरह अपने हाथों में ले ली। उन्होंने साबित कर दिया कि वे परंपराओं की दास नहीं हैं, बल्कि राज्य की रक्षक हैं।

गुरिल्ला रणनीति का ईजाद किया

बता दें कि रानी दिद्दा ने अपने शासनकाल में रक्षा नीति को एक नया आयाम दिया। वे अच्छी तरह जानती थीं कि विशाल सेनाओं का मुकाबला केवल सीधे युद्ध से नहीं किया जा सकता। उन्होंने कम साधनों में अधिकतम परिणाम देने के लिए गुरिल्ला (छापामार) युद्ध नीति ईजाद की।

इतिहास में दर्ज है कि उन्होंने मात्र 500 प्रशिक्षित लड़ाकों की मदद से 35,000 की विशाल विरोधी सेना को महज 45 मिनट के अंदर धूल चटा दी थी। उन्होंने दुनिया की शुरुआती कमांडो जैसी सैन्य टुकड़ियों की नींव रखी और अपने दुश्मनों को ऐसा सबक सिखाया कि उनकी सीमा की तरफ देखने की भी कोई हिम्मत न कर सके।

महमूद गजनवी को धूल चटाने वाली अभेद्य किलाबंदी

जिस महमूद गजनवी ने भारत के कई हिस्सों में प्रवेश कर सोमनाथ मंदिर सहित अनेक शहरों को तहस-नहस किया, उसे रानी दिद्दा की रणनीति ने हार का सामना कराया। रानी दिद्दा ने पीर पंजाल की पहाड़ियों में लोहारकोट के किले को इतना अभेद्य बना दिया था कि गजनवी जब भी उत्तर की ओर से भारत में घुसने की कोशिश करता, उसे भारी पराजय का सामना करना पड़ता। रानी दिद्दा की बनाई इसी रक्षा नीति और रणनीति के कारण गजनवी को लगातार दो बार मुंह की खानी पड़ी और हारकर अपना रास्ता बदलना पड़ा। नतीजतन, उसे कश्मीर का मार्ग छोड़कर गुजरात के रास्ते भारत में प्रवेश करने पर मजबूर होना पड़ा।

इतिहास में छिप गई क्वीन ऑफ कश्मीर की कहानी

अब आप सोच रहे होंगे कि इतनी करिश्माई और शक्तिशाली शासिका होने के बावजूद, भारतीय इतिहास में रानी दिद्दा का जिक्र धुंधला क्यों रहा? इसका मुख्य कारण समाज का वह रवैया था, जो अपनी हार को स्वीकार नहीं कर पाया और इस वीरांगना की गाथा को इतिहास से ओझल कर दिया, लेकिन लेखक आशीष कौल ने अपनी चर्चित पुस्तक 'दिद्दा द वारियर क्वीन ऑफ कश्मीर' के माध्यम से इस वीरांगना की कहानी को फिर से जीवंत कर दिया है।

यह किताब यह सवाल उठाती है कि जिस रानी ने अपनी शर्तों पर नियम बनाए और 50 वर्षों तक अखंड कश्मीर पर राज किया, उसे भारत के मुख्य इतिहास में वह स्थान क्यों नहीं मिला जिसकी वह हकदार थी।

रानी दिद्दा की कहानी केवल इतिहास का एक पन्ना नहीं है, बल्कि यह आज की हर उस महिला के लिए प्रेरणा है जो विपरीत परिस्थितियों और शारीरिक सीमाओं से जूझ रही है। उन्होंने साबित किया कि अगर इरादे मजबूत हों, तो शारीरिक अपंगता भी सफलता के रास्ते में बाधा नहीं बन सकती।

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Images: magnific