हमारे यहां भारत में कई ऐसे राज्‍य हैं ज‍िनकी अपनी खासि‍यत हैं। उन्‍हीं में से एक है गुजरात। सालों साल टूर‍िस्‍ट की भीड़ यहां देखने को म‍िलती है। सावन और नवरात्र‍ि के मौके पर तो यहां की अलग रौनक देखने को म‍िलती है। सावन बीत चुका है। अब अगले महीने यानी अक्‍टूबर में नवरात्रि पड़ेगी। ऐसे में अगर आप इस दौरान गुजरात जाने का प्लान बना रही हैं, तो गरबा की धूम तो आपको हर गली में दिखेगी, लेकिन यहां आपको देवी मां की भक्ति का एक और भी जबरदस्त और पुराना रूप द‍ेखने को म‍िलेगा। इसे 'डाकला' (Dakla) कहते हैं, जो क‍ि एक तरह का लोकनृत्‍य है।

आपने आमतौर पर गरबा के बारे में ही सुना होगा। गरबा जहां धीमी चाल और सुकून भरा होता है, वहीं डाकला की बात ही अलग है। इसमें ढोल और डाक की धुन इतनी तेज और जोशीली होती है कि पूरा माहौल भक्ति के रंग में सराबोर हो जाता है। डाकला को लोग मनोरंजन या शौक के लिए नहीं करते बल्कि यह मां अंबे के चामुंडा और मेलड़ी जैसे शक्तिशाली रूपों को याद करने का एक तरीका है। आज हम आपको अपने इस लेख में डाकला नृत्‍य के बारे में बता रहे हैं। आइए जानते हैं-

Image Credit- Magnific

डाकला नृत्य क्या होता है?

आपको बता दें क‍ि डाकला गुजरात का एक लोक नृत्य है, जिसका संबंध देवी की आराधना यानी क‍ि पूजा से है। खासकर नवरात्रि के दौरान इसे किया जाता है। इस नृत्य में मां अंबे के चामुंडा और मेलड़ी जैसे रूपों का आह्वान किया जाता है। डाकला की खास बात इसकी तेज चाल और जोश से भरी ताल है। लोग गोल घेरा बनाकर तेज स्‍पीड से घूमते हुए नृत्य सानी डांस करते हैं। इस दौरान देवी के मंत्र और गीत भी गाए जाते हैं। गुजरात के कच्छ में डाकला नृत्‍य जरूर की जाती है।

यह भी पढ़ें- राजस्थान के इस पारंपरिक नृत्य से खौफ खाते थे अंग्रेज? जानें इसके पीछे का रोचक इतिहास

डाकला नाम कहां से आया?

अब आप सोच रही होंगी कि‍ इसका नाम डाकला कैसे पड़ा? दरअसल, डाकला का नाम एक खास वाद्य यंत्र (Musical Instrument) डाक से जुड़ा है। यह देखने में डमरू जैसा लगता है, लेकिन उसका आकार डमरू से थोड़ा बड़ा होता है। पुराने समय में जनजातीय समुदाय (Tribal Community) के लोग देवी की पूजा करते समय डाक बजाते थे। मान्यता थी कि देवी को प्रसन्न करने और गांव को आपदाओं और बीमारियों से बचाने के लिए उनकी पूजा की जाती थी। ऐसे में डाक की तेज और दूर तक सुनाई देने वाली आवाज के साथ नृत्य भी होने लगा। समय के साथ इसी तरह किए जाने वाले नृत्य को डाकला कहा जाने लगा।

यह भी पढ़ें- Odisha Folk Dance: देवदासी परंपरा से जन्मा है ओडिशा का यह लोकनृत्य, जहां लड़के करते हैं लड़क‍ियों जैसा श्रृंगार

डाकला से जुड़ी खास बातें

हम आपको डाकला की कुछ बातें प्‍वाइंटर्स में भी बता रहे हैं, ज‍िसे आसानी से समझा जा सकता है।

  • डाकला गुजरात का लोक नृत्य है।
  • इसकी जड़ें जनजातीय और लोक परंपराओं से जुड़ी हैं।
  • इसमें डाक नाम का वाद्य यंत्र बजाया जाता है।
  • इस नृत्‍य में मां अंबे के चामुंडा और मेलड़ी रूपों का आह्वान किया जाता है।
  • नवरात्रि में इसका आयोजन खासतौर पर होता है।
  • कच्छ में डाकला नृत्‍य जरूर होता है।
  • इस नृत्य में तेज ताल पर गोल घेरे में घूमते हुए नृत्य किया जाता है।
 
Image Credit- Magnific

बुरी शक्तियों से बचाता है डाकला

ऐसा बताया जाता है क‍ि डाकला की शुरुआत इसल‍िए की गई थी ताक‍ि लोगों को बुरी शक्‍त‍ियों से बचाया जा सके। पुराने समय में जब गांवों के लोगों के सामने आपदाओं जैसे भूकंप या बाढ़ और बीमारियों जैसी परेशानियां आती थीं, तब जनजातीय समुदाय देवी की आराधना करते थे। इसी दौरान डाक बजाया जाता था। लोग देवी को प्रसन्न करने के लिए उनकी पूजा करते और डाक की आवाज के साथ नृत्य करते थे। इस तरह डाकला सिर्फ एक नृत्य नहीं रहा बल्कि देवी की साधना से जुड़ी एक लोक परंपरा बन गया।

यह भी पढ़ें- गुजराती शादी से पहले क्यों रखा जाता है गरबा-डांडिया प्रोग्राम?

गरबा से कितना अलग है डाकला?

अब आपके मन में सवाल आ रहा होगा क‍ि गरबा के बारे में हम सभी जानते हैं, लेक‍िन डाकला का तरीका क्‍या है? दरअसल, डाकला गरबा से काफी अलग है। गरबा में आमतौर पर लोग एक तरह से घूमते हुए नृत्य करते हैं, जबकि डाकला में तेज स्‍पीड और ज्यादा एनर्जी वाली ताल पर नृत्य किया जाता है। इसमें डाक की तेज धुन के साथ लोग गोल घेरे में घूमते हैं। इस दौरान देवी के गीत गाए जाते हैं और उनका आह्वान किया जाता है।

अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।

Cover Image Credit- AI