मध्य प्रदेश में भोपाल के पास बेतवा नदी के तट पर स्थित भोजेश्वर शिव मंदिर प्राचीन आस्था और वास्तुकला का एक बेजोड़ उदाहरण है। 11वीं शताब्दी में बना यह ऐतिहासिक मंदिर अपने विशाल शिवलिंग और अनोखी संरचना के लिए दुनिया भर में प्रसिद्ध है। राजा भोज के काल में बनी यह इमारत तीन बड़े बांधों से घिरी एक विशाल झील के किनारे स्थित थी। पहला बांध बेतवा नदी पर, दूसरा मेंडुआ गांव के पास और तीसरा कलियासोत नदी का पानी बेतवा की ओर मोड़ने के लिए बनाया गया था। ऐसे में इस मंदिर के महत्व के बारे में जानते हैं आगे...

मंदिर का अधूरा इतिहास

अपनी भव्यता के बावजूद भोजेश्वर मंदिर की निर्माण प्रक्रिया कभी पूरी नहीं हो सकी। इतिहासकार मानते हैं कि प्राकृतिक आपदा, साधनों की कमी या किसी युद्ध की वजह से इसका काम बीच में ही रुक गया था। 1950 तक बारिश के पानी और पत्थरों के टूटने के कारण इमारत काफी कमजोर हो चुकी थी। साल 1951 में प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम 1904 के तहत इसे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को सौंप दिया गया।

भोजेश्वर मंदिर परिसर का महत्व?

यदि आप इस पावन धाम की यात्रा का प्लान बना रहे हैं, तो यहां की खास चीजों का अनुभव करना न भूलें।

  • गर्भगृह का मुख्य द्वार 33 फीट (10 मीटर) ऊंचा है, जिस पर अप्सराओं, शिव गणों और नदी देवियों की प्रतिमाएं उकेरी गई हैं। परिसर में शिव-पार्वती, ब्रह्मा-शक्ति, राम-सीता और विष्णु-लक्ष्मी की सुंदर मूर्तियां भी मौजूद हैं। मंदिर की दीवारें लाल बलुआ पत्थर की हैं और इसमें कोई खिड़की नहीं बनाई गई है।
  • सावन के अलावा महाशिवरात्रि का अवसर यहां आने के लिए सबसे खास माना जाता है। इस दौरान मध्य प्रदेश सरकार द्वारा हर साल 'भोजपुर सांस्कृतिक उत्सव' आयोजित किया जाता है।

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क्यों हुआ मंदिर का निर्माण?

भोजेश्वर शिव मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में परमार राजवंश के प्रतापी राजा भोज द्वारा करवाया गया था। भगवान शिव को समर्पित इस भव्य मंदिर में दुनिया के सबसे बड़े एकाश्म (एक ही पत्थर से बने) शिवलिंगों में से एक स्थापित है। राजा भोज ने इस मंदिर का निर्माण अपनी गहरी धार्मिक आस्था प्रकट करने के लिए कराया था। इसके अलावा, यह मंदिर स्थानीय नदियों पर बांध बनाकर तैयार किए गए तट को सुंदर और पवित्र बनाने की एक बड़ी योजना का हिस्सा था।

मंदिर के अधूरे रहने के कारण

इतनी विशाल योजना होने के बावजूद भोजेश्वर मंदिर का निर्माण कार्य अचानक रुक गया और यह अधूरा रह गया। इतिहासकारों के अनुसार, भोज का अचानक निधन होना या फिर युद्ध के खतरों के कारण राज्य के संसाधनों को अन्य जरूरी कार्यों में लगाना हो सकता है। वहीं दूसरी ओर, स्थानीय लोककथाओं के अनुसार, कारीगरों ने इस विशाल मंदिर को केवल एक ही रात में पूरा करने का प्रयास किया था, लेकिन सुबह सूर्योदय होते ही इस समय-सीमा के समाप्त हो जाने के कारण निर्माण कार्य को वहीं रोकना पड़ा।

आसपास मौजूद घूमने के स्थल

भोजेश्वर मंदिर के दर्शन के साथ-साथ आप भोपाल के आसपास की इन प्रसिद्ध ऐतिहासिक जगहों की सैर भी कर सकते हैं।

  • ताज-उल-मस्जिद: मंदिर से थोड़ी दूरी पर स्थित यह मस्जिद भारत की सबसे बड़ी मस्जिदों में से एक है।
  • भीमबेटका की गुफाएं: यूनेस्को की विश्व धरोहर में शामिल यह स्थान प्राचीन मानव सभ्यता का गवाह है।

भोजेश्वर मंदिर का समय

यात्रा की तैयारी करने से पहले इन जानकारियों को नोट कर लें।

  • दर्शन का समय: मंगलवार से शनिवार सुबह 6:00 बजे से शाम 7:00 बजे तक। सोमवार को मंदिर बंद रहता है।
  • प्रवेश शुल्क: मंदिर में प्रवेश पूरी तरह नि:शुल्क है, हालांकि चार पहिया वाहन के लिए 30 रुपये पार्किंग शुल्क देना होता है।
  • घूमने का सबसे अच्छा समय: अक्टूबर से अप्रैल के बीच का मौसम यहां घूमने के लिए सबसे अच्छा होता है। यदि आप गर्मियों में जा रहे हैं, तो सुबह जल्दी या दोपहर 3:00 बजे के बाद जाएं ताकि धूप से बचा जा सके।

कैसे पहुंचे?

भोजेश्वर मंदिर भोपाल शहर से लगभग 30 किलोमीटर दूर भोजपुर गांव में स्थित है। ज्यादातर पर्यटक भोपाल में ठहरते हैं और वहां से कैब या बस के जरिए आसानी से मंदिर दर्शन के लिए पहुंच जाते हैं।

निष्कर्ष

भोजेश्वर शिव मंदिर अधूरा होने के बावजूद इसकी भव्यता भक्तों और पर्यटकों को शांति का अहसास कराती है। यदि आप मध्य प्रदेश की यात्रा की योजना बना रहे हैं, तो इसका अनुभव आपकी यादों में हमेशा के लिए बस जाएगा।

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Images: wikipedia