रामलीला केवल पौराणिक कथा का नाट्य रूपांतरण नहीं है, बल्कि यह हर साल हमें अपने अंदर झांकने और नैतिक मूल्यों को दोबारा से जिंदा करने का  मौका देती है। साल 2008 में यूनेस्को (UNESCO) ने रामलीला को अपनी "मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत" (Representative List of the Intangible Cultural Heritage of Humanity) में आधिकारिक तौर पर शामिल किया था। इसका कारण केवल इसकी विशालता नहीं बल्कि यह तथ्य था कि यह विभिन्न धर्मों, जातियों और बोलियों को एक डोरी में पिरोने का काम करती है। आज के मॉडर्न डिजिटल दौर में जहां थिएटर और लोक कलाएं खत्म होती नजर आ रही हैं, वहीं रामलीला आज भी हर वर्ग के लोगों को एक मंच से जोड़ने का काम करता है। आज के इस लेख में हम आपको देश के अलग-अलग हिस्सों में होने वाले रामलीला के रोचक मंचन के तरीके के बारे में बताने जा रहे हैं।

देश में कहां होती है अलग तरीके की रामलीला

रामलीला की कहानी और पात्र भले ही एक हो, लेकिन इसका मंचन हर जगह अलग-अलग तरीके से किया जाता है। आज हम आपको 5 ऐसी जगहों के बारे में बताने जा रहे हैं, जहां रामलीला का प्रस्तुतीकरण खास अंदाज में किया जाता है।

1. रामनगर, वाराणसी की 'पर्यावरण-शैली' रामलीला

वाराणसी के रामनगर की रामलीला दुनिया में सबसे अलग मानी जाती है। यहां पर किसी प्रकार का कोई पक्का मंच या माइक-लाउडस्पीकर इस्तेमाल नहीं किया जाता है। पूरा रामनगर शहर ही रंगमंच में बदल जाता है। जनकपुरी, अयोध्या और लंका के लिए अलग-अलग स्थान तय होते हैं और लगभग एक महीने तक दर्शक कलाकारों के साथ एक जगह से दूसरी जगह पैदल यात्रा करते हैं।

2. कुमाऊं, उत्तराखंड की शास्त्रीय और संगीतमय रामलीला

उत्तराखंड के अल्मोड़ा और नैनीताल क्षेत्र में रामलीला के दौरान पूरा माहौल संगीतमय होता है। यहां रामचरितमानस की चौपाइयों को शास्त्रीय रागों जैसे राग भैरवी, बिहाग और काफी में गाकर प्रस्तुत किया जाता है। इस शैली की शुरुआत 19वीं सदी के मध्य में हुई थी।

3. लखनऊ के 'बख्शी का तालाब' की सांप्रदायिक सौहार्द वाली रामलीला

उत्तर प्रदेश के बख्शी का तालाब, लखनऊ में आयोजित होने वाली रामलीला सामाजिक एकता की अनूठी मिसाल है। यहां पर कई प्रमुख पात्रों जैसे राम, लक्ष्मण, हनुमान का अभिनय मुस्लिम कलाकार और युवा करते हैं। यह परंपरा दशकों से चली आ रही है।

4. असम की 'अंकिया नाट' और भावना शैली

पूर्वोत्तर भारत में श्रीमंत शंकरदेव द्वारा शुरू की गई अंकिया नाट परंपरा के तहत रामलीला का प्रस्तुतीकरण होता है। यहां पर मास्क यानी मुखौटों, विशेष परिधानों और पारंपरिक वाद्यों का प्रयोग करके रामकथा को बेहद कलात्मक तरीके से दर्शकों को दिखाया जाता है।

5. दक्षिण भारत में छाया नाटक रामलीला

दक्षिण भारत के केरल में तोलपावक्कूत्थु और ओडिशा में रावणछाया जैसी कठपुतली कलाओं के माध्यम से रामलीला दिखाई जाती है। इसमें चमड़े की बनी कठपुतलियों की परछाईं को कपड़े के पर्दे पर संगीत और संवादों के साथ प्रस्तुत किया जाता है।

हर तबके के लोगों को जोड़ने का काम करती है रामलीला

UNESCO के आधिकारिक अभिलेखागार के अनुसार, रामलीला गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित 'रामचरितमानस' पर आधारित एक ऐसा प्रदर्शन है, जिसमें गीत, संगीत, संवाद और सामूहिक भागीदारी का अनूठा मिश्रण होता है। यूनेस्को ने इस बात को विशेष रूप से सराहा है कि यह परंपरा समाज के हर तबके को जोड़ती है। यहां दर्शक केवल बैठकर देखते ही नहीं हैं, बल्कि वे भी आरती, जयकारों और भजनों के माध्यम से इस अनुष्ठान का अभिन्न हिस्सा बन जाते हैं।

रामलीला भारत की उस अमर संस्कृति का प्रमाण है जो सदियों से बहती आ रही है। यूनेस्को की यह विश्व धरोहर हमें सिखाती है कि बुराई पर अच्छाई की जीत केवल एक दिन का त्योहार नहीं, बल्कि हर दिन अपने आचरण में उतारने योग्य जीवन-मूल्य है। अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।

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UNESCO Intangible Cultural Heritage Portal: UNESCO के आधिकारिक अमूर्त सांस्कृतिक विरासत पोर्टल से जानकारी ली गई है।

Ministry of Culture, Government of India: भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय का राष्ट्रीय पोर्टल, जो भारत की अमूर्त सांस्कृतिक धरोहरों के इतिहास और मान्यता की आधिकारिक जानकारी देता है।

Sangeet Natak Akademi (संगीत नाटक अकादमी)