पुरी में निकलने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। यह रथ यात्रा हर साल आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को निकाली जाती है। यह यात्रा केवल पुरी में ही नहीं बल्कि बल्कि देश-विदेश में कई स्थानों पर निकाली जाती हैं। ओडिशा के बारीपदा में भी हर साल जगन्नाथ रथ यात्रा का आयोजन किया जाता है। यह रथ यात्रा बहुत ही विशेष होती है क्योंकि इसमें देवी सुभद्रा का रथ पुरुषों की जगह महिलाएं खींचती हैं। इस प्रथा के पीछे की क्या कहानी है, चलिए हम आपको बताते हैं।
महिलाओं को ही मिलता है रथ खींचने का अधिकार
आमतौर पर जगन्नाथ रथ यात्रा में महिलाएं और पुरुष दोनों ही रथ खींचने में भाग लेते हैं। श्रद्धालुओं के बीच रथ खींचने को लेकर काफी उत्साह देखने को मिलता है क्योंकि इसे बेहद पुण्यदायी माना जाता है। इस दौरान कई बार धक्का मुक्की भी होती है। ऐसा केवल पुरी नहीं बल्कि जहां-जहां रथ यात्रा का आयोजन होता है वहां-वहां देखने को मिलता है। ऐसे में बारीपदा में यात्रा निकालने वाले संगठन ने महिलाओं के सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए और उनको भी पूर्ण रूप से रथ यात्रा में भाग लेने का अवसर देने के उद्देश से यह फैसला लिया था कि देवी सुभद्रा के रथ को खींचने का अधिकार केवल महिलाओं को दिया जाएगा।
रथ यात्रा के दौरान हजारों महिलाएं मिलकर इस रथ को खींचती हैं। इस रथ को खींचने के लिए न तो उम्र देखी जाती है, न ही किसी की जाति। देवी का रथ हर किसी को खींचने का अधिकार होता है। जब महिलाओं को रथ खींचते देखा जाता है, तो यह दृश्य न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि महिलाओं की शक्ति और उनके सम्मान का भी संदेश देता है।
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क्या है इस अनोखी परंपरा की कहानी?
इस विशेष परंपरा की शुरुआत वर्ष 1975 में हुई थी। उस समय अंतरराष्ट्रीय महिला वर्ष मनाया जा रहा था। महिलाओं को समाज में अधिक सम्मान और समान अवसर देने के उद्देश्य से कई पहल की जा रही थीं। इसी दौरान बारीपदा की रथ यात्रा समिति ने एक अनूठा निर्णय लिया और देवी सुभद्रा के रथ को महिलाओं द्वारा खींचे जाने की परंपरा शुरू की। इस विचार को देशभर में खूब पसंद किया गया, तब से हर वर्ष इस परंपरा को निभाया जा रहा है।
जब यह प्रथा शुरू की गई थी, तब इसे पहले के रूप में लोगों ने स्वीकार किया था। जैसे-जैसे साल बीतते गए इस प्रथा की वजह से बारीपदा रथ यात्रा को एक नई पहचान मिली। शुरुआत में यह एक नई पहल थी, लेकिन समय के साथ यह बारीपदा रथ यात्रा की पहचान बन गई। पिछले लगभग 50 वर्षों से यह परंपरा लगातार निभाई जा रही है। हर साल बड़ी संख्या में महिलाएं इस अवसर का इंतजार करती हैं और पूरे उत्साह के साथ रथ खींचने में हिस्सा लेती हैं। इस प्रथा के कारण हर वर्ष रथ यात्रा के दौरान कई विदेशी पर्यटक भी यहां इस अनुपम दृश्य को देखने के लिए आते हैं।
महिला सशक्तिकरण का अनूठा संदेश
बारीपदा की यह रथ यात्रा केवल धार्मिक महत्व ही नहीं रखती, बल्कि सामाजिक दृष्टि से भी बेहद खास मानी जाती है। यह परंपरा इस बात का प्रतीक है कि पुरुष और महिलाएं समाज में बराबरी का दर्जा रखते हैं। वहीं यह परंपरा वर्षों पहले शुरू किए गए एक सकारात्मक प्रयास की मिसाल भी पेश करती है।
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