किसी महिला की जब शादी हो जाती है और वह लंबे समय तक मां न बने, तो ना केवल समाज बल्कि घर वाले भी उसे ताना देने से नहीं थकते हैं। ऐसा ही कुछ हाल कर्नाटक की रहने वाली सालुमरादा थिममक्का के साथ हुआ था। हालांकि, उन्होंने इस ताने को मजबूरी की तरह नहीं बल्कि इससे मजबूती के साथ लड़ा। इसके बाद उन्होंने जो किया वह पूरी दुनिया में एक मिसाल बन गई। आज के इस लेख में हम भारत की पहली ट्री वुमेन थिममक्का के बारे में बताने जा रहे हैं।
समाज के तानों को बनाया मजबूती
थिमक्का का जन्म कर्नाटक के गुब्बी तालुक एक गरीब परिवार में हुआ था। बड़ी होने के बाद उनका विवाह चिक्कैया नाम के खेतिहर मजदूर से करा दी गई थी। शादी के कई साल बीत जाने के बाद भी जब वह मां नहीं बनीं, तो समाज ने उन्हें बांझ कहकर प्रताड़ित करना शुरू कर दिया। इन तानों से थिमक्का परेशान रहने लगे। एक समय ऐसा आया जब वह अपनी जिंदगी खत्म करने के बारे में सोचा, लेकिन उनके पति में उन्हें समझाया और संभाला। इसके बाद उन्होंने प्रकृति को अपने संतान की तरह पालने लगे।
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सूने हाईवे को बनाया अपनी नर्सरी
थिमक्का और उनके पति ने अपने गांव हुलिकल और कुदूर के बीच मौजूद चार किलोमीटर लंबे नेशनल हाईवे को इस काम के लिए चुना। वहां दूर-दूर तक कोई पेड़ नहीं था। उन्होंने तय किया कि वे इस रास्ते को बरगद के पेड़ लगाएंगे। उन्होंने पहले साल बरगद की डालियों से तैयार 4 पौधे लगाए, अगले साल 15 पौधे लगाए और धीरे-धीरे यह संख्या सैकड़ों में पहुंच गई। वे केवल पौधे लगाते नहीं थे, बल्कि उन्हें आवारा पशुओं से बचाने के लिए चारों तरफ कंटीली झाड़ियों का घेरा भी बनाते थे।
अपनी कमाई से किया पेड़-पौधों की देखभाल
चिक्कैया और थिमक्का दोनों मजदूरी करते थे। वे हर दिन सुबह उठकर मजदूरी पर जाने से पहले और वहां से लौटने के बाद पौधों को पानी देते थे। पानी का कोई नजदीकी स्रोत न होने के कारण, दोनों पति-पत्नी सिर और कंधों पर पानी के घड़े लादकर मीलों दूर से आते थे। गर्मियों के दिनों में जब पौधे सूखने लगते, तो थिमक्का अपनी पूरी दिहाड़ी उनके पानी के इंतजाम में लगा देती थीं। पति की मृत्यु के बाद भी थिमक्का ने इस काम को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया।
थिमक्का को इस कार्य के लिए पद्म श्री सम्मान
थिमक्का ने हाईवे के उस हिस्से पर करीब 385 विशाल बरगद के पेड़ खड़े कर दिए, जो आज एक घने जंगल की तरह दिखते हैं। इसके अलावा उन्होंने अपने जीवन में 8,000 से अधिक अन्य पेड़ भी लगाए हैं। उनके लगाए पेड़ों की कीमत आज करोड़ों रुपये आंकी जाती है। इस कार्य के लिए उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया। साथ ही कर्नाटक के केंद्रीय विश्वविद्यालय ने वर्ष 2020 में थिमक्का के लिए मानद डॉक्टरेट की घोषणा की है।
थिमक्का के नाम के आगे लगे सालुमरदा का अर्थ
कन्नड़ भाषा में सालुमरदा का मतलब पेड़ों की कतार होता है। इसी वजह से दुनिया उन्हें आदर से सालुमरदा थिमक्का बुलाने लगी। साल 2019 में, जब थिमक्का की उम्र 100 वर्ष से अधिक हो चुकी थी, भारत सरकार ने उनकी इस नि:स्वार्थ सेवा के लिए उन्हें देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से एक 'पद्म श्री' से नवाजा। वृक्ष माता के नाम से मशहूर सालुमरदा थिमक्का का निधन 114 वर्ष में बेंगलुरू में 14 नवंबर 2025 को हुआ था।
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