भारत देश में विजयदशमी यानी दशहरा बड़ी ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। उत्तर भारत में दशहरा मुख्य रूप से रामलीला और रावण दहन के लिए जाना जाता है, लेकिन बात करें दक्षिण भारत के कर्नाटक की, तो कर्नाटक का 'मैसूर शहर' बहुत ही भव्य तरीके से दशहरा मनाता है। मैसूर का दशहरा अपनी शाही शान और भव्यता के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। इस उत्सव की सबसे खास बात यह है कि यहां 400 साल पुरानी ऐतिहासिक परंपरा का पालन किया जाता है, जिसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग यहां आते हैं।
मैसूर का शाही दशहरा
मैसूर का दशहरा हर साल एक बेहद अलग और अनोखे तरीके से मनाया जाता है। यहां सोने के सिंहासन पर विराजमान मां चामुंडेश्वरी की प्रतिमा, शाही सजे-धजे हाथी, मैसूर पैलेस की अद्भुत खूबसूरती और वाडियार राजवंश की शाही परंपरा इस उत्सव को और भी खास बना देती है। आइए जानते हैं मैसूर राजपरिवार की इस 400 साल पुरानी परंपरा के बारे में विस्तार से।
मैसूर के शाही दशहरे का इतिहास
मैसूर जिला प्रशासन और कर्नाटक सरकार और मैसूर पैलेस बोर्ड का आधिकारिक पोर्टल के अनुसार मैसूर के शाही दशहरे का इतिहास सदियों पुराना है। मैसूर में शाही दशहरा मनाने की शुरुआत राजा वाडियार ने सन 1610 में श्रीरंगपट्टनम से की थी। उसके बाद जब मैसूर के राजाओं ने अपनी राजधानी बदली, तो यह शानदार शाही परंपरा मैसूर पैलेस में आयोजित होने लगी। यह परंपरा महान विजयनगर साम्राज्य से जुड़ी हुई है। जब विजयनगर साम्राज्य का नाश हुआ, तो वाडियार राजवंश ने उनकी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत और परंपराओं को टूटने नहीं दिया। यह परंपरा आज भी उसी तरीके से निभाई जाती है। वाडियार राजपरिवार के सदस्य और कर्नाटक सरकार मिलकर इस खास परंपरा को सेलिब्रेट करते हैं।
प्रसिद्ध 'जम्बू सवारी' और सोने का सिंहासन
विजयदशमी के खास मौके पर मैसूर की सड़कों पर एक बहुत ही भव्य जुलूस निकाला जाता है। इस जुलूस को 'जम्बू सवारी' यानी हाथी जुलूस के नाम से जाना जाता है। इस पूरी सवारी का सबसे बड़ा आकर्षण हाथी पर रखा एक सोने का सिंहासन होता है, जिसे 'अम्बारी' कहा जाता है। इसका वजन करीब 750 किलोग्राम होता है और यह पूरी तरह प्योर सोने से बना होता है। इस सिंहासन के अंदर माता चामुंडेश्वरी की पवित्र मूर्ति विराजमान की जाती है।
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हाथी का योगदान
इस परंपरा के लिए एक खास हाथी चुना जाता है। हाथी को बेहद शानदार और पारंपरिक तरीके से सजाया जाता है। सवारी शुरू होने से पहले मैसूर राजपरिवार के सदस्य और मुख्यमंत्री हाथ जोड़कर पूजा-अर्चना करते हैं और हाथी पर फूलों की वर्षा करके इस यात्रा की शुरुआत करते हैं। यह खास जुलूस मैसूर पैलेस से शुरू होकर 'बन्नी मंडप मैदान' तक जाता है, जो करीब 5 किलोमीटर का रास्ता तय करता है। इस पूरे रास्ते में पारंपरिक भजन, ढोल-नगाड़े, बैंड और पुलिस दल भी साथ चलता है। इस अद्भुत सवारी को देखने के लिए लाखों लोग देश-विदेश से पहुंचते हैं।
मैसूर पैलेस की रोशनी और शाही दरबार
दशहरे के दौरान पूरे मैसूर शहर को एक लाख से भी ज्यादा खूबसूरत और रंग-बिरंगे बल्बों से सजाया जाता है। शाम होते ही जब ये सारी लाइटें एक साथ जगमगाती हैं, तो उसका नजारा वाकई देखने लायक होता है। नवरात्रि के पावन दिनों में मैसूर राजपरिवार के वर्तमान वंशज शाही पोशाक पहनते हैं और रत्नजड़ित सिंहासन पर बैठकर खास 'निजी दरबार' आयोजित करते हैं। यह नजारा पुराने राजा-महाराजाओं के समय की याद दिला देता है। विजयदशमी की रात को बन्नी मंडप मैदान में शानदार 'मार्शल परेड' का आयोजन किया जाता है। इस दौरान खतरनाक स्टंट और पारंपरिक कलाबाजियां देखने को मिलती हैं। यह शानदार परेड 10 दिनों तक चलने वाले इस महान महोत्सव का समापन करती है।
निष्कर्ष: मैसूर का दशहरा उत्सव केवल एक त्योहार नहीं, बल्कि हमारी समृद्ध ऐतिहासिक विरासत और शाही परंपरा का प्रतीक है। 400 सालों से यह परंपरा ठीक उसी तरह चली आ रही है जैसे पहले हुआ करती थी। ऐतिहासिक जंबू सवारी और जगमगाते मैसूर पैलेस को देखने के लिए आज भी लोग दूर-दूर से यहां खिंचे चले आते हैं। अगर आप भी इस साल एक शानदार और ऐतिहासिक दशहरा देखना चाहती हैं, तो मैसूर जाकर इस अद्भुत अनुभव का हिस्सा बन सकती हैं। यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहे हर जिंदगी से।
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