हमारा देश भारत न जाने कितने व्रत, त्योहारों और संस्कृतियों का समावेश है। हर एक पर्व की अलग खासियत है और हर अवसर का एक अलग मतलब। ऐसे ही हर साल ओडिशा के पुरी में निकलने वाली जगन्नाथ रथ यात्रा दुनिया के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में से एक मानी जाती है। इस यात्रा में भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा भव्य रथों पर सवार होकर गुंडिचा मंदिर तक जाते हैं। रथ यात्रा का मुख्य आकर्षण सिर्फ भगवानों के दर्शन तक सीमित नहीं होता है, बल्कि इन विशाल रथों का निर्माण और उनकी अनोखी बनावट भी लोगों के बीच आकर्षण का केंद्र मानी जाती है। इन रथों की सबसे खास बात यह होती है कि हर साल इन तीनों रथों का निर्माण नए सिरे से किया जाता है। आइए आपको बताते हैं रथ यात्रा के तीनों रथों की अनोखी संरचना के बारे में।
कब शुरू होता है जगन्नाथ रथ यात्रा के लिए रथ का निर्माण?
जगन्नाथ रथ यात्रा के लिए रथों का निर्माण अक्षय तृतीया के दिन से शुरू होता है, इसे हिंदू धर्म में अत्यंत शुभ अवसर माना जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन शुरू किया गया कोई भी कार्य सफल और फलदायी होता है, इसलिए इसी दिन रथ यात्रा के लिए रथों का निर्माण कार्य शुरू होता है। रथ निर्माण की शुरुआत विशेष वैदिक अनुष्ठानों और हवन के साथ होती है।
मंदिर के पुजारी पूजा-अर्चना करके मुख्य कारीगरों को माला अर्पित करते हैं। इसके बाद तीनों रथों का निर्माण एक साथ शुरू किया जाता है और लगभग एक ही समय पर पूरा भी किया जाता है। इन तीनों रथों का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उनके पहिए होते हैं। भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के तीनों रथों के लिए कुल 42 पहिए बनाए जाते हैं। इन पहियों को तैयार करने के बाद उन्हें रथ के मुख्य ढांचे में लगाया जाता है।
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रथों की सजावट होती है अलग
जगन्नाथ रथ यात्रा के रथों की खूबसूरती उनकी कलात्मक सजावट में छिपी होती है। ओडिशा की पारंपरिक मंदिर वास्तुकला से प्रेरित नक्काशी रथों पर की जाती है। लकड़ी पर उकेरे गए डिजाइन और रंग-बिरंगी पेंटिंग इन रथों को भव्य रूप प्रदान करती हैं। रथों के ऊपर लगाए जाने वाले विशाल कपड़े के छत्र लाल, पीले, हरे और काले रंगों से सजाए जाते हैं। इन कपड़ों पर पारंपरिक कढ़ाई की जाती है, जो रथों की सुंदरता को और ज्यादा बढ़ा देती है।
नंदीघोष- भगवान जगन्नाथ का रथ
भगवान जगन्नाथ के रथ का नाम नंदीघोष होता है। इसकी ऊंचाई लगभग 45 फीट होती है। इसमें 16 विशाल पहिए लगाए जाते हैं। रथ का प्रमुख रंग लाल और पीला होता है, जबकि इसे खींचने वाले घोड़े सफेद रंग के होते हैं।
तालध्वज- भगवान बलभद्र का रथ
भगवान बलभद्र के रथ को तालध्वज कहा जाता है। इसकी ऊंचाई भी लगभग 45 फीट होती है और इसमें 14 पहिए लगाए जाते हैं। यह रथ लाल और हरे रंग से सजाया जाता है। इसके घोड़े काले रंग के होते हैं।
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दर्पदलन- देवी सुभद्रा का रथ
देवी सुभद्रा का रथ दर्पदलन या देबदलन कहलाता है। इसकी ऊंचाई लगभग 44 फीट 6 इंच होती है और इसमें 12 पहिए लगे होते हैं। रथ का प्रमुख रंग लाल और काला होता है। इसे खींचने वाले घोड़े लाल रंग के होते हैं।
बिना कील के होता है रथों का निर्माण
रथ बनाने की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इनमें किसी भी धातु का इस्तेमाल नहीं होता है बल्कि इनमें सिर्फ लकड़ियों का इस्तेमाल किया जाता है। इसके निर्माण में लकड़ी के हिस्सों को आपस में जोड़ने के लिए खांचे और लकड़ी की खूंटियों का इस्तेमाल किया जाता है। इसी वजह से इस संरचना को और भी खास माना जाता है।
पुरी की जगन्नाथ रथ यात्रा केवल एक धार्मिक उत्सव नहीं है बल्कि शिल्पकला, आस्था और संस्कृति का अद्भुत संगम मानी जाती है। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
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