स्वतंत्रता दिवस 2026 के मौके पर हम आप एक ऐसी महिला को याद कर रहे हैं, जिन्होंने महिलाओं को विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। विज्ञान की दुनिया में जब पुरुषों का दबदबा था और महिलाओं के लिए उच्च शिक्षा के दरवाजे लगभग बंद थे, तब एक भारतीय महिला ने अपनी दृढ़ इच्छाशक्ति से इतिहास रच दिया। यह कहानी है डॉ. कमला सोहोनी की, जिन्होंने न केवल भारत की पहली महिला पीएचडी वैज्ञानिक बनने का गौरव हासिल किया, बल्कि नोबेल पुरस्कार विजेता सर सी.वी. रमन जैसे दिग्गज वैज्ञानिक के भेदभाव वाले फैसले को चुनौती देकर भारतीय महिलाओं के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान के नए रास्ते भी खोले। जानते हैं इनके बारे में सब कुछ...

कमला सोहोनी की शुरुआती शिक्षा

कमला सोहोनी का जन्म 18 जून 1912 को बड़ौदा के एक अत्यंत शिक्षित और प्रतिष्ठित परिवार में हुआ था। उनके पिता नारायण राव भागवत और चाचा माधव राव भागवत दोनों ही केमिस्ट्री के विद्वान थे और मुंबई के प्रेसीडेंसी कॉलेज से स्नातक थे।

कमला के पिता की इच्छा थी कि उनकी बेटी प्रसिद्ध वैज्ञानिक मैडम क्यूरी की तरह विज्ञान के क्षेत्र में देश का नाम रोशन करे। बचपन से ही मेधावी कमला ने अपने पिता के सपने को अपना लक्ष्य बना लिया।

मुंबई विश्वविद्यालय में अव्वल स्थान

कमला ने सेंट जेवियर्स कॉलेज से अपनी स्नातक की पढ़ाई पूरी की। उन्होंने मुंबई विश्वविद्यालय की फिजिक्स और केमिस्ट्री की परीक्षा में सर्वोच्च स्थान हासिल कर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाया।

स्नातक में उत्कृष्ट प्रदर्शन के बाद, कमला ने मास्टर्स डिग्री के लिए बैंगलोर स्थित देश के सबसे प्रतिष्ठित संस्थान 'इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस' (IISc) में आवेदन किया। उस समय महान वैज्ञानिक सर सी.वी. रमन इस संस्थान के निदेशक थे।

सी.वी. रमन का इनकार

कमला को पूरा विश्वास था कि उनकी योग्यता के आधार पर उन्हें आसानी से दाखिला मिल जाएगा, लेकिन उन्हें तब गहरा झटका लगा जब सी.वी. रमन ने उनके आवेदन को केवल इसलिए खारिज कर दिया क्योंकि वह एक महिला थीं। सी.वी. रमन का मानना था कि महिलाएं वैज्ञानिक शोध के योग्य नहीं होतीं और वे प्रयोगशाला का ध्यान भटका सकती हैं।

कमला इसके आगे झुकने वाली नहीं थीं। महात्मा गांधी के सत्याग्रह के सिद्धांतों पर चलते हुए, कमला ने सी.वी. रमन के कार्यालय के बाहर धरना शुरू कर दिया और अपनी योग्यता साबित करने का अवसर मांगा। आखिरकार रमन को झुकना पड़ा, लेकिन उन्होंने कमला के सामने कई अपमानजनक शर्तें रखीं:

  • कमला को नियमित छात्र का दर्जा नहीं मिलेगा, वे केवल एक साल की प्रोबेशन अवधि पर रहेंगी।
  • उन्हें अपने गाइड के निर्देशानुसार देर रात तक काम करना होगा।
  • वे प्रयोगशाला के माहौल को खराब या प्रभावित नहीं करेंगी।

कड़ी मेहनत और सी.वी. रमन की सोच में बदलाव

22 साल की कमला ने इन कठिन और भेदभाव वाली शर्तों को स्वीकार कर लिया। उन्होंने बायोकेमिस्ट्री विभाग के प्रसिद्ध वैज्ञानिक श्रीनिवासया के मार्गदर्शन में काम करना शुरू किया।

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दूध और दालों पर शोध

कमला ने भारतीय दालों, दूध और लेग्युम में मौजूद प्रोटीनों और पोषक तत्वों पर गहन अध्ययन किया। 1935 से 1936 के बीच उनके कई शोध पत्र अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए।

महिलाओं के लिए खुले IISc के दरवाजे

कमला की लगन और शानदार शोध के कारण सी.वी. रमन को अपना फैसला बदलना पड़ा। उन्होंने न केवल कमला को डिस्टिंक्शन्स के साथ मास्टर्स की डिग्री दी, बल्कि संस्थान के दरवाजे हमेशा के लिए महिला शोधकर्ताओं के लिए भी खोल दिए। कमला की इस पहली जीत के बाद अन्ना मणि, ललिता चंद्रशेखर और के. सुनंदाबाई जैसी महान महिला वैज्ञानिकों को भी वहां दाखिला मिला।

कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय और वैश्विक पहचान

1936 में मास्टर्स पूरा करने के बाद कमला को इंग्लैंड की प्रसिद्ध कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय में शोध करने का मौका मिला।

कैम्ब्रिज में पीएचडी और साइटोक्रोम सी की खोज

कैम्ब्रिज में डॉ. डेरेक रिक्टर के साथ काम करते हुए कमला ने पाया कि पौधे की हर कोशिका में 'साइटोक्रोम सी' नाम का एक एंजाइम मौजूद होता है, जो पौधों में ऊर्जा उत्पादन के लिए जिम्मेदार है। यह एक ऐतिहासिक खोज थी। केवल 14 महीनों में अपना शोध पूरा कर उन्होंने पीएचडी की डिग्री हासिल की और भारत की पहली महिला पीएचडी वैज्ञानिक बनीं। पीएचडी पूरी करने के बाद कमला अपने ज्ञान का उपयोग देश सेवा के लिए करने भारत लौट आईं।

विभिन्न पदों पर सेवाएं

  • 1939 में वे लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज, दिल्ली में बायोकेमिस्ट्री विभाग की अध्यक्ष बनीं।
  • इसके बाद उन्होंने कुन्नूर के न्यूट्रिशन रिसर्च इंस्टीट्यूट में सह-निदेशक के रूप में काम किया।
  • बाद में वे मुंबई के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस में बायोकेमिस्ट्री विभाग की प्रोफेसर और निदेशक बनीं।

नीरा पर शोध और राष्ट्रपति पुरस्कार

उन्होंने ताड़ के रस से बनने वाले 'नीरा' पेय पदार्थ पर विशेष शोध किया। उन्होंने साबित किया कि नीरा में विटामिन सी और अन्य पोषक तत्व प्रचुर मात्रा में होते हैं, जो कुपोषित बच्चों और गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए बेहद लाभदायक हैं। उनके इस जनहितकारी शोध के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने उन्हें प्रतिष्ठित राष्ट्रपति पुरस्कार से सम्मानित किया।

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1969 में सेवानिवृत्त होने के बाद 1998 में इस महान वैज्ञानिक ने दुनिया को अलविदा कह दिया। डॉ. कमला सोहोनी की जीवन यात्रा केवल वैज्ञानिक उपलब्धियों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह लैंगिक विषमता और रूढ़िवादी सोच के खिलाफ एक ऐतिहासिक क्रांति की कहानी है। 

सार

स्वतंत्रता दिवस के खास मौके पर कमला सोहनी का जीवन आज भी देश की लाखों बेटियों को विज्ञान और अनुसंधान के क्षेत्र में आगे बढ़ने और हर चुनौती का निडरता से सामना करने की प्रेरणा देता है।

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