शादी के बाद एक लड़की की लाइफ पूरी तरह से बदल जाती है। रीति-रिवाजों के साथ-साथ नए लोग और ढेरों नई उम्मीदों के बीच खुद को ढालना किसी बड़ी चुनौती से कम नहीं होता। ऐसे में महिलाएं एक अजीब कशमकश से गुजरती हैं, एक तरफ बचपन के घर यानी मायके की यादें तो दूसरी तरफ ससुराल की नई जिम्मेदारियां। इन दोनों के बीच संतुलन न बना पाने के कारण कई बार महिलाएं स्ट्रेस और गिल्ट महसूस कर सकती हैं। ऐसे में इनके बारे में पता होना जरूरी है। आज का हमारा लेख इसी विषय पर है। आज हम आपको अपने इस लेख के माध्यम से बताएंगे कि होम सिकनेस और ससुराल की जिम्मेदारी के बीच कैसे बैलेंस करें? इसके लिए हमने कोच और हीलर, लाइफ अल्केमिस्ट, साइकोथेरेपिस्ट डॉ. चांदनी तुगनैत (Dr. Chandni Tugnait) से भी बात की है। जानते हैं इस लेख के माध्यम से...

हम क्यों फंस जाते हैं होम-सिकनेस और जिम्मेदारियों के बीच?

जैसे ही शादी होती है वैसे ही उम्मीदों का बोझ अचानक बढ़ जाता है। मायके में जहां एक लड़की बिना किसी फिक्र के अपनी मर्जी से जीती है, वहीं ससुराल आते ही वह बहू, पत्नी और भाभी जैसे कई नए रिश्तों से बंध जाती है। माता-पिता का लाड-प्यार और वहां की आजादी याद आने पर आज की जिम्मेदारियां एक बोझ की तरह लगने लगती हैं। 

कैसे करें डील?

खुद से एक ही दिन में परफेक्ट बहू बनने की उम्मीद न करें। नए घर के तौर-तरीकों, पसंद-नापसंद और रूटीन को समझने के लिए खुद को पूरा समय दें।

ससुराल के सदस्यों के साथ बैठकर चाय पीना, उनकी पुरानी बातें सुनना या घर के कामों में हाथ बंटाना आपको उनके करीब लाएगा। पुराना अकेलापन धीरे-धीरे कम होने लगेगा।

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 माता-पिता से बात करना या मिलना बिल्कुल सही है, लेकिन दिनभर फोन पर मायके की चर्चा करने से बचें। 

नोट - एक्सपर्ट्स मानते हैं कि इस दौर में पति की भूमिका सबसे अहम होती है। जब भी मायके की याद सताए, तो रोने या उदास रहने के बजाय अपने पार्टनर से खुलकर बात करें। उन्हें बताएं कि आप कैसा महसूस कर रही हैं।

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