जब एक नई दुल्हन पहली बार ससुराल की दहलीज पार करती है तो सबसे पहला शब्द उसे यही सुनने को मिलता है कि, ''बहू, घूंघट कर लो''। पहले के वक्त में इसे लाज, शर्म और संस्कार का नाम दिया गया था। परंतु घूंघट प्रथा ने भारत में कदम कहां से रखा? वैदिक काल में भारत की महिलाएं घूंघट नहीं करती थीं।
वहीं, खजुराहो से लेकर एलोरा तक, किसी भी प्राचीन मंदिर की मूर्ति में आपको कोई महिला घूंघट में नहीं मिलेगी। सोचने वाली बात यह है कि जो प्रथा हमारे वेद और पुराणों में है ही नहीं, वो अब के वक्त में बड़ा संस्कार कैसे बन गई? क्या है घूंघट प्रथा का इतिहास? आइए दिल्ली यूनिवर्सिटी के विवेकानंद महिला कॉलेज की हिस्ट्री की प्रोफेसर यूथिका मिश्रा से जानते हैं।
कहां से आई घूंघट प्रथा?
घूंघट को सिर्फ एक कपड़ा समझने की गलती मत कीजिए। ये मध्यकालीन भारत का वो इतिहास है जिससे बहुत ही कम लोग परिचित हैं। पहले के समय में महिलाएं साड़ी पहनती थीं और उसका पल्लू सिर पर हल्का सा रखती थीं ताकि सम्मान दिखे। चेहरे को पूरी तरह ढकने का कोई रिवाज नहीं था।
Photo Credit: Pinterest (Tanya)
फिर समय बदला। 12वीं सदी के बाद जब दिल्ली सल्तनत आई और बाहरी आक्रमण लगातार होने लगे तो समाज में डर का माहौल बन गया। परिवारों को लगने लगा कि उनकी बहू-बेटियों की इज्जत खतरे में है। इसी डर से घूंघट को धीरे-धीरे आगे खींचकर चेहरे तक लाया जाने लगा ताकि चेहरा छुप जाए। कोई बुरी नजर न पड़े। राजस्थान के राजपूत राजाओं में तो ये प्रथा धीरे-धीरे शान की बात बन गई थी।
प्राचीन और वैदिक काल में नहीं थी घूंघट की प्रथा
माना जाता है कि वैदिक काल में सिर ढकने जैसी कोई परंपरा नहीं थी। उस वक्त मैत्रेयी, गार्गी, लोपामुद्रा जैसे महान महिलाएं बिना सिर ढके पुरुषों के साथ बैठकर बड़े बड़े फैसले किया करती थीं। रामायण, महाभारत और बौद्ध काल में भी महिलाओं के लिए सिर ढंकने की कोई बाध्यता नहीं थी। प्राचीन मंदिरों के स्तंभों पर उत्कीर्ण गंधर्व, देव या यक्षों की मूर्तियों में किसी भी महिला के सिर या चेहरे को आप घूंघट से ढका हुआ नहीं देखेंगे। उस समय साड़ी का आंचल होता था, जिसे सिर पर सम्मान के लिए रखा जाता था, चेहरे को पूरी तरह ढकने के लिए नहीं।
मध्यकाल से शुरू हुआ बदलाव
घूंघट रखने की असली प्रथा मध्यकालीन भारत से हुई थी। इतिहासकार मानते हैं कि इसकी व्यापक शुरुआत दिल्ली सल्तनत की स्थापना 1206 ईसवी के बाद हुई। इसके मुख्य रूप से दो कारण थे-
- सुरक्षा का कारण: लगातार विदेशी आक्रमण और राजनीतिक अस्थिरता के दौरान परिवारों ने महिलाओं को अपहरण और असुरक्षा से बचाने के लिए पर्दा और एकांत का सहारा दिया था।
- पर्दा प्रथा का प्रभाव: इस्लामिक शासन के साथ आए पर्दा प्रथा से प्रभावित होकर राजस्थान के राजपूत राजाओं ने 15वीं शताब्दी के आसपास इसे अपनाया और यह एक प्रतिष्ठा का प्रतीक बन गया था।
Photo Credit: Magnific
राजस्थान से पूरे उत्तर भारत में कैसे पहुंची थी घूंघट प्रथा
ऊंची जातियों और अमीर परिवारों में यह दिखाने के लिए कि वह अपने घर की महिलाओं को बाहर काम करवाए बिना पाल सकते हैं, घूंघट को अपनाया गया। यह सुरक्षा के साथ-साथ लोगों के लिए स्टेटस सिंबल भी बन गया था। राजस्थान, निमाड़ और मालवा से यह प्रथा धीरे-धीरे यूपी, बिहार, हरियाणा और मध्य प्रदेश तक फैल गई। मुगल काल में इसने अपनी जड़ें और मजबूत कर ली थीं।
आज के संदर्भ में घूंघट प्रथा
आज के वक्त में घूंघट प्रथा भारत से काफी हद तक खत्म हो चुकी है। वहीं, कुछ परिवारों में इसे आज भी संस्कार और लाज का सबसे बड़ा माना जाता है, जबकि कई जगहों पर इसे पितृसत्तात्मक सोच का एक रूप माना जाता है। शहरों में यह प्रथा लगभग खत्म हो गई है, लेकिन ग्रामीण उत्तर भारत में अभी भी ये प्रथा गहरी जड़ें जमाए हुए है।
घूंघट प्रथा किसी प्राचीन भारतीय परंपरा या धर्म का हिस्सा न होकर सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों की देन थी। समय के साथ जिन सामाजिक सुरक्षा कारणों से इसे अपनाया गया था, वे आज के आधुनिक दौर में महत्वपूर्ण नहीं रह गई हैं। आज जब महिलाएं हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो रही हैं, तब परंपरा और संस्कार का असली पैमाना चेहरे को ढकना नहीं, बल्कि सम्मान और विचारों की स्वतंत्रता होना चाहिए। अगर आपको यह स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
-1792568963577_m.webp)