हिंदू धर्म में हरतालिका तीज और गणेश चतुर्थी के पर्वों का आपस में बहुत गहरा और अनोखा संबंध है। एक ओर जहां माता पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या करके उन्हें अपने वर के रूप में प्राप्त किया था, वहीं दूसरी ओर उनके पुत्र गणेश जी समस्त देवी-देवताओं में प्रथम पूज्य बने। मगर क्या आपने कभी सोचा है कि जब महादेव को देवों के देव कहा जाता है, तो फिर गणपति बप्पा प्रथम पूज्य क्यों हैं? नीचे लेख में वाराणसी के पंडित राघवेंद्र तिवारी से जानें इन दोनों पर्वों की बीच का कनेक्शन। 

माता पार्वती की तपस्या और शिव-प्राप्ति

पौराणिक कथाओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए जंगल में बालू और मिट्टी के शिवलिंग बनाकर कठोर तपस्या की थी। उनकी इस कठिन साधना (जिसे हरतालिका तीज के रूप में मनाया जाता है) से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। शिव और पार्वती का यह मिलन जगत के कल्याण का आधार बना, जिससे आगे चलकर परिवार की स्थापना हुई और देव संस्कृति का विस्तार हुआ।

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गणेश जी का जन्म और गजानन स्वरूप

शिव-पार्वती के मिलन के उपरांत, एक बार माता पार्वती ने अपने उबटन से एक सुंदर बालक की रचना की और उसमें प्राण फूंक दिए। उन्होंने उस बालक को अपना द्वारपाल बनाकर आदेश दिया कि उनकी अनुमति के बिना अंदर कोई न आए। जब भगवान शिव वहां पहुंचे, तो बालक गणेश ने उन्हें भी अंदर जाने से रोक दिया। इस पर शिव के गणों और गणेश जी के बीच युद्ध हुआ और अंततः क्रोधित होकर भगवान शिव ने त्रिशूल से उस बालक का सिर काट दिया।

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माता पार्वती का क्रोध और पुनर्जीवित

अपने पुत्र की ऐसी दशा देखकर माता पार्वती अत्यंत क्रोधित हो उठीं और उन्होंने पूरी सृष्टि की व्यवस्था को स्तब्ध करने का संकल्प ले लिया। तब उनके क्रोध को शांत करने और पुत्र मोह को संतुष्ट करने के लिए भगवान शिव ने उत्तर दिशा में सबसे पहले मिलने वाले जीव यानी हाथी का सिर उस बालक के धड़ पर रखकर उसे पुनर्जीवित किया। शिव जी ने उसे अपने गणों का मुख्य बनाया, जिससे वह गणपति कहलाए।

गणपति प्रथम पूज्य क्यों बनें?

गणेश जी के प्रथम पूज्य बनने के पीछे मुख्य कथा यह है कि एक बार जब ब्रह्मांड में सभी देवी-देवताओं ने अपने-अपने श्रेष्ठ होने का दावा किया, तब परीक्षा के रूप में माता पार्वती और शिव जी की परिक्रमा करने को कहा गया। जहां कार्तिकेय अपने वाहन पर बैठकर पूरी पृथ्वी की परिक्रमा करने निकल गए।

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वहीं गणेश जी ने अपनी बुद्धि का परिचय देते हुए अपने माता-पिता की ही तीन परिक्रमा कर ली और कहा कि उनके लिए पूरा ब्रह्मांड उनके माता-पिता के चरणों में ही है। गणेश जी की इस अगाध बुद्धि, विवेक और माता-पिता के प्रति अटूट श्रद्धा से प्रसन्न होकर समस्त देवी-देवताओं और महादेव ने यह वरदान दिया कि किसी भी शुभ कार्य या यज्ञ की शुरुआत में सबसे पहले गणेश जी की ही पूजा की जाएगी।

इस प्रकार, माता पार्वती की तपस्या से शिव का वर मिला और उसी शिव-पार्वती के घर उपजे बालक गणेश अपनी बुद्धि के बल पर 'प्रथम पूज्य' बने। जहां हरतालिका तीज भाद्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि और गणेश चतुर्थी का पर्व भाद्र मास की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है यानी एक दिन बाद

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