इन दिनों गणेश उत्सव की धूम देखने को मिल रही है। इस दौरान लोग घर में बप्पा के मूर्ति की स्थापना करते हैं। साथ ही पूजा-पाठ और आरती भी करते हैं, लेकिन क्या आपने नोटिस किया है कि हिंदू धर्म में जब भी कभी किसी देवी-देवता की पूजा या आरती की जाती है तो उसकी शुरुआत भले ही सुखकर्ता-दुखहर्ता, ऊं जय शिव ओंकारा या ऊं जय अंबे गौरी आरती से हाे, लेकिन उसका समापन हमेशा प्रसिद्ध प्रार्थना 'घालील लोटांगन वंदीन चरण' से ही किया जाता है।
आमतौर पर लोगों को लगता है कि यह किसी एक ही भगवान की प्रार्थना है, लेकिन असल में यह अलग-अलग संतों और ग्रंथों से ली गई रचनाओं का एक बहुत सुंदर मेल है। हालांकि, कई लोगों के मन में सवाल आता है कि इसे हमेशा आरती के अंत में ही क्यों गाया जाता है और इसका मतलब क्या है? दरअसल इसके पीछे धार्मिक और आध्यात्मिक दोनों वजहें जुड़ी हुई हैं। बलरामपुर के ज्योतिषाचार्य निर्मल पंडित ने इसके बारे में विस्तार से जानकारी दी है। आइए जानते हैं-
Image Credit- Magnific
आरती के अंत में ही क्यों गाया जाता है 'घालीन लोटांगण'?
इस प्रार्थना को आरती के बिल्कुल आखिर में गाने के पीछे का सबसे बड़ा कारण 'पूरा समर्पण' है। जैसे-
पूजा का समापन करना और सब कुछ ईश्वर को सौंपना
आपको बता दें कि जब हम आरती गा लेते हैं, तो कपूर जलाकर भगवान की पूजा का समापन करते हैं। ऐसे में सबसे लास्ट में भगवान से हम यही कहते हैं कि हे ईश्वर, हमने अपने शरीर, मन, वाणी और कर्मों से जो भी पूजा या काम किया है, वह हम सबकुछ आपको ही समर्पित करते हैं।
ब्रह्मांड तक पहुंचना
शुरुआत में आरती तो हम किसी एक भगवान की करते हैं, जैसे भगवान गणेश, महादेव या दुर्गा मां, लेकिन घालीन लोटांगण बोलते ही बात सीधे पूरे ब्रह्मांड को चलाने वाली उस एक बड़ी शक्ति (नारायण यानी भगवान विष्णु) पर आ जाती है। इसलिए आप चाहे किसी भी भगवान की पूजा करें, आखिर में यह श्लोक बोलने से सब कुछ ब्रह्मांड तक पहुंच जाता है।
घालीन लोटांगण आरती का लिरिक्स और उसका सही मतलब
घालीन लोटांगण वाली यह प्रार्थना कुल पांच हिस्सों में बंटी है, जिसे अलग-अलग महान संतों ने रचा है-
पहला हिस्सा (संत नामदेव)
'घालीन लोटांगण वंदीन चरण, डोळ्यांनी पाहीन रूप तुझे। प्रेमे आलिंगिन आनंदे पूजिन, भावे ओवाळीन म्हणे नामा॥'
मतलब- इसमें संत नामदेव ने कहा है कि हे प्रभु, मैं आपके चरणों में लेटकर वंदन करता हूं या करती हूं। अपनी आंखों से आपके सुंदर रूप को देखता हूं, आपको प्रेम से गले लगाता हूं और पूरी खुशी और भाव से आपकी पूजा करके आरती उतारता हूं।
दूसरा हिस्सा (आद्य शंकराचार्य)
'त्वमेव माता पिता त्वमेव, त्वमेव बंधुश्च सखा त्वमेव। त्वमेव विद्या द्रविणं त्वमेव, त्वमेव सर्वं मम देवदेव॥'
मतलब- इसमें आद्य शंकराचार्य ने कहा है कि हे परमेश्वर तू ही मेरी माता है, तू ही मेरे पिता हैं, तू ही मेरा भाई है और तू ही मेरा सखा है। तू ही शाश्वत अंतिम ज्ञान है। तू ही मेरी सच्ची संपत्ति है। हे परमेश्वर, तू ही मेरा सब कुछ है।
Image Credit- Shutterstock
तीसरा हिस्सा (श्रीमद्भागवत पुराण)
'कायेन वाचा मनसेंद्रियैर्वा, बुध्यात्मना वा प्रकृतिस्वभावात्। करोमि यद्यत्सकलं परस्मै। नारायणायेति समर्पयामि॥'
मतलब- यह लाइन श्रीमद्भागवत पुराण से ली गई है। इसका मतलब है जो मैं शरीर से, वाणी से, मन से और सभी इंद्रियों से जागरूक होकर जो-जो काम करता हूं वह सब कुछ ब्रह्मांड यानी नारायण को अर्पित करता हूं।
यह भी पढ़ें- आरती के समय दीपक हाथ में रखना चाहिए या थाली में?
चौथा हिस्सा (आदि शंकराचार्य कl अच्युताष्टकम)
'अच्युतं केशवं रामनारायणं, कृष्ण दामोदरं वासुदेवं हरिम्। श्रीधरं माधवं गोपिकावल्लभं, जानकीनायकं रामचंद्र भजे॥'
मतलब- यह चौथा पद आदि शंकराचार्य के अच्युताष्टकम् से है। इसमें भगवान के अलग-अलग नामों (अच्युत, केशव, राम, कृष्ण, हरि) को याद करके प्रार्थना की गई है। भगवान भले ही अनेक रूपों और नामों में दिखते हों, लेकिन वे सब एक ही परम शक्ति (परब्रह्म) हैं, जो हमें हर संकट से बचाते हैं।
पांचवां हिस्सा (कलिसन्तरण उपनिषद)
'हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे। हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे॥'
मतलब- यह कलिसन्तरण उपनिषद से लिया गया है। 'घालीन लोटांगण' प्रार्थना का यह आखिरी श्लोक है। इसमें प्रार्थना का समापन करते हुए सभी देवी-देवताओं को विनम्र होकर नमस्कार किया गया है।
यही वजह है कि यह प्रार्थना हमें घमंड से दूर, भगवान के चरणों में पूरी तरह समर्पित कर देती है। इसीलिए आरती के अंत में इसे गाकर पूजा को पूरा किया जाता है।
यह भी पढ़ें- Parvati Song Meaning: 'काय जिद कर रही, काय को मर रही' हनुमान अंश के भजन 'पार्वती' का क्या है हिंदी मतलब?
अगर आपको ये स्टोरी अच्छी लगी है, तो इसे शेयर जरूर करें। ऐसी ही अन्य स्टोरी पढ़ने के लिए जुड़ी रहें हरजिंदगी से।
Image Credit- AI
-1789459977763_m.webp)